Shopkeepers in Subathu facing slow down due to corona
सुबाथू (सोलन)। देश की 62 छावनियों में अलग पहचान रखने वाली सुबाथू छावनी के व्यापारी मंदी की मार झेल रहे हैं। स्थानीय दुकानदारों की मानें तो सुबाथू का प्रत्येक व्यापारी आज भी व्यापार की दृष्टि से सेना पर निर्भर है।
अब सैनिक क्षेत्र में शॉपिंग कांपलेक्स खुलने से बाजार का व्यापारी मंदी की मार झेल रहा है। लोगों का कहना है कि कोरोना महामारी के बीच सुबाथू का व्यापार पूरी तरह से खत्म हो चुका है। बाजार में पिछले एक वर्ष से ग्राहकों की भारी कमी देखने को मिली है। ऐसे में बाहरी राज्यों के कई दुकानदारों को दुकानों पर ताले लगाकर घर लौटना पड़ रहा है। कोई भी सरकार छावनी वासियों की सुध लेने को तैयार नहीं है।
सुबाथू छावनी के युवा दुकानदार देवेंद्र शर्मा का कहना है कि पिछले एक वर्ष से सुबाथू का व्यापारी मंदी की मार झेल रहा है। दुकानदार पदम शर्मा का कहना है कि कोरोना में सेना के जवान बाजार नहीं आ रहे जिससे व्यापार को काफी नुकसान पहुंच रहा है।
1815 में गोरखा राइफल की स्थापना
ब्रिटिश हुकूमत ने 1815 में देश की रक्षा के लिए सुबाथू की भूमि को चुना और सुबाथू में प्रथम गोरखा राइफल की स्थापना की। इसके बाद सेना की जरूरतों को पूरा करने के लिए सुबाथू बाजार में व्यापार का सिलसिला शुरू हुआ। 1875 में सुबाथू छावनी को तृतीय श्रेणी का दर्जा मिला। सुबाथू का व्यापारी पूरे प्रदेश को व्यापार देता रहा। जो आढ़त बाजार कभी पूरे प्रदेश के व्यापारियों को खच्चरों से राशन पहुंचाता था, उस बाजार में आज सन्नाटा है। केंद्र और राज्य सरकार की अनदेखी से आज सुबाथू का युवा रोजगार की तलाश में यहां से पलायन करने को मजबूर है।