संवाद न्यूज एजेंसी दाड़लाघाट (सोलन)। श्री बाडूबाड़ा देव प्रांगण में श्री शिव महापुराण कथा के सप्तम दिवस आचार्य हरि महाराज ने श्रद्धालुओं को त्याग, परोपकार और लोक कल्याण का संदेश दिया। उन्होंने शिव के नीलकंठ स्वरूप का वर्णन करते हुए इस संदेश को समझाया।
आचार्य हरि महाराज ने समुद्र मंथन की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि मंथन से निकले भयंकर विष से समस्त सृष्टि संकट में पड़ गई थी। देवता और दानव कोई भी उस विष के प्रभाव को सहन नहीं कर पा रहे थे। तब भगवान शिव ने लोक कल्याण के लिए उस विष का पान कर लिया।
माता पार्वती ने विष को उनके कंठ में रोक दिया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया। इसी कारण भगवान शिव नीलकंठ महादेव कहलाए। आचार्य हरि महाराज ने कहा कि यह प्रसंग सिखाता है कि समाज और मानवता के हित के लिए त्याग और सेवा का भाव सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने जोर दिया कि भगवान शिव ने अपने कष्ट की चिंता किए बिना संपूर्ण सृष्टि की रक्षा की। यह निस्वार्थ सेवा का सर्वोच्च उदाहरण है। कथा के दौरान पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।
श्रद्धालु भक्ति रस में सराबोर दिखाई दिए। भगवान शिव के भजनों और जयकारों से प्रांगण गूंज उठा।