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....तनख्वाह है कम, बागवां इसलिए फूल खिलाना नहीं चाहता

Thu, 02 Feb 2017 10:14 PM IST
ब्यूरो, सोलन
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ऐसा मंच जहां युवा कवियों की सरलता का वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुभव से आमना सामना हो और साथ-साथ कविताओं तथा शायरी से लिपटी बसंत ऋतु का आगाज तो फिर कुछ खास क्यों न होगा। - फोटो : अमर उजाला
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ऐसा मंच जहां युवा कवियों की सरलता का वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुभव से आमना सामना हो और साथ-साथ कविताओं तथा शायरी से लिपटी बसंत ऋतु का आगाज तो फिर कुछ खास क्यों न होगा। आज के दौर की बसंत ऋतुु का बखान युवा कवि विनोद रोहतकी अपने अंदाज में कर रहे हैं। कह रहे हैं कि सूख जाती हैं बेलें खिलने से पहले ही, बसंत मेरे बगीचे में आना नहीं चाहता, काम है मेहनत का, तनख्वाह है कम, बागवां इसलिए फूल खिलाना नहीं चाहता। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेम लाल गौतम प्रकृति रस में डूबी अपनी कविता जन-मन में नवल प्रणाम, बसंत पंचमी तुम्हें प्रणाम और पद्म देव शास्त्री बसंती हवा हूं मैं, बहती थी, बहती हूं बहती रहूंगी कहकर बसंत ऋतु का स्वागत किया।
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सरमौर से आए वयोवृद्ध कवि हेत राम पहाड़िया और देवेंद्र शास्त्री ने पर्यावरण की चिंता को गंभीरता से लेते हुए लंबी रचनाएं प्रस्तुत कर लोगों को भविष्य की ओर संकेत किया। भाषा एवं संस्कृति विभाग जिला सोलन द्वारा बसंत पंचमी के अवसर पर बाल पुस्तकालय सभागार में बहुभाषी कवि सम्मेलन में नई और पुरानी पीढ़ि की सोच का संगम खूब देखने को मिला। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता अकादमी के पूर्व सचिव डॉ. हरिदत्त शर्मा ने की।  कवि सम्मेलन में हिंदी, संस्कृत और उर्दू भाषा के साथ कवियों ने पहाड़ी बोली में अपनी रचनाएं प्रस्तुत कीं। आगाज किशोरी लाल कौंडल ने किया।
 
हेमंत अत्री ने बसंत का स्वागत अपनी व्यंग्यात्मक पहाड़ी रचना में कुछ इस प्रकार किया। राच गोआ प्यारा नानका लोको, बसंत आया बड़ा खाणका लोको। इसी तरह राम लाल राही ने भी आया बसंत पंचमी रा त्यौहार, चहू कनारे फैली बहार कविता सुनाई। पवन शर्मा ने परिवार में बेटियों की भूमिका के महत्व का बखान मां-बाप की जिंदगी का स्वप्न होते हैं बेटे, उनके स्वप्नों को चार चांद लगाती है बेटियां पंक्तियों से किया।
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ममता ठाकुर ने अपनी कविता में बापू गांधी को कुछ इस तरह से श्रद्धांजलि दी कि दूर जाकर भी अमिट छाप छोड़ जाते हैं कुछ लोग, धरती पर रहकर भी सूरज की तरह चमकते हैं कुछ लोग। एसआर आर्य ने कुछ इस तरह से अपना शायराना अंदाज व्यक्त किया न रख उम्मीदे-वफा किसी परिंदे से, जब पर निकल आते हैं तो अपने आशियां भूल जाते हैं। अनुराधा और राधा चौहान ने अपनी रचनाएं सुनाकर श्रोताओं का भरपूर मनोरंजन किया।

  नवोदित कवि जगदीश कश्यप, कमल कुमार, बीआर आजाद और राघव शर्मा की प्रस्तुति भी सराहनीय रहीं। कार्यक्रम में भाषा अधिकारी भीम सिंह चौहान, संत राम शर्मा, एचएस ठाकुर, दीपक कश्यप उपस्थित रहे। इस अवसर पर नप के पूर्व अध्यक्ष कुल राकेश पंत वशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि विभाग का यह प्रयास सराहनीय है, उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रमों में युवाओं को अधिक से अधिक मौका दिए जाने से उनके व्यक्तित्व में निखार आता है।
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