अर्की (सोलन)। अर्की के ओखरू गांव में श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य राम स्वरूप शांडिल्य ने सुदामा के प्रसंग का वर्णन किया। कहा कि सुदामा भिक्षा मांगने पर जो मिलता थो उससे संतुष्ट रहते थे। अगर भिक्षा नहीं मिलती तो उनकी पत्नी अपने बच्चों को एकादशी का व्रत कहकर भूखे ही सुला देती थीं। एक दिन उनकी पत्नी भूख से कांपते हुए अपने पति के पास गई और बोली कि श्रीकृष्ण आपके सखा हैं। वे ब्राह्मणों के परम भक्त हैं। आप उनके पास जाइए। जब वे आपकी व्यथा जानेंगे तो वे आपको बहुत सा धन देंगे और मुझे विश्वास है कि वह हमारी दरिद्रता दूर कर देंगे। जब सुदामा की पत्नी ने कई बार द्वारका जाने की प्रार्थना की तो वे जाने को तैयार हुए। सुदामा श्रीकृष्ण के महल में पहुंचे। सब लोग उनकी दीनहीन अवस्था देखकर उन पर हंस रहे थे। उन्होंने द्वारपाल से कहा कि श्रीकृष्ण से कह दो की उनसे मिलने उनके बचपन का सखा सुदामा आया है। सुदामा नाम सुनते ही श्रीकृष्ण की खुशी का ठिकाना ना रहा और नंगे पांव दौड़ते हुए दरवाजे तक पहुंचे। उन्होंने सुदामा को अपने अंगपाश में समेट लिया, मित्र तुम आए तो लेकिन बहुत कष्ट भोगने के बाद आए। भगवान श्रीकृष्ण ने सुदामा को अपने पास बिठाया और अपने अश्रुओं से सुदामा के चरण धुलाए।