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पर्यटन की दृष्टि से संवरे बणिया देवी तो मिलेगा रोजगार

Fri, 01 Jul 2016 09:47 PM IST
ब्यूरो, सोलन
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पर्यटन विभाग की हर गांव की कहानी में बणिया देवी मंदिर को शामिल कर लिया है। लेकिन इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से निखारने को लेकर कोई कवायद शुरू नहीं हुई। - फोटो : अमर उजाला
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पर्यटन विभाग की हर गांव की कहानी में बणिया देवी मंदिर को शामिल कर लिया है। लेकिन इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से निखारने को लेकर कोई कवायद शुरू नहीं हुई। गांव बणिया देवी जिला सोलन शिमला-नालागढ़ मार्ग पर कुनिहार से करीब 3 किमी की दूरी पर साधारण पहाड़ी शैली में बणिया देवी का प्राचीन मंदिर प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण है। लोगों का कहना है कि यदि इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से संवारा जाए तो स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
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मान्यता है कि रियासतकाल में जब कुछ राजपूत राजा उज्जैन से बघाट रियासत में रहने आए तो उन्होंने इस स्थान पर अपनी कुलदेवी की स्थापना की थी। इस देवी को दस भुजाओं वाली सिंह वाहिनी माना जाता है। यह स्थली बणी नाम से भी पहचानी जाती है। लगभग 10-12 बीघे में फैले आम और अमरूद के बागों की महक में आम के वृक्ष के पास चमत्कारी जल स्रोत है। इस स्रोत का पानी किसी भी मौसम में कम नहीं होता। साथ ही निकटवर्ती गावों जैसे शाकली, कौटी और बणिया देवी के गांववासी अधिकतर इसी चश्मे के पानी का प्रयोग करते हैं। इसी चश्मे के फूटने अथवा बणिया देवी के प्रकट होने की लोक कथा है। एसडीएम अर्की एलआर वर्मा ने कहा कि पर्यटन विभाग इसके लिए प्रयासरत है।

राजा को कहा था मंदिर बनाओ
साहित्यकार एवं संस्कृत विद डॉ. प्रेम गौतम के मुताबिक ऐसी मान्यता है कि कुनिहार के राजा हरदेव सिंह को ब्रह्म मुहूर्त में दृष्टांत में भविष्य वाणी हुई कि मैं वन देवी दुर्गा तुम्हारे बगीचे में जन कल्याण के लिए प्रकट होना चाहती हूं। मेरा मंदिर बनाओ। धर्म परायण राजा हरदेव सिंह ने राज पंडितों को बुलाकर सभा में सारी बात बताई। ज्योतिषाचार्य ने गणना की और भविष्यवाणी को सही ठहराते हुए राणा जी को देवी की प्रतिमा निकालने का निर्देश दिया। शुभ मुहूर्त में सांकेतिक स्थान की बगीचे में खुदाई की। थोड़ी सी खुदाई पर ही इस स्थल पर मां दुर्गा माता की प्रतिमा और प्रतिमा के साथ तीन अन्य प्राचीन प्रतिमाएं निकलीं। इन्हें माता दुर्गा मानकर स्थापित किया गया।
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और फिर जमीन से फूट पड़ा चश्मा
स्थानीय लोगों कृष्ण लाल, जगदीश कुमार, अशोक कुमार, मनोज कुमार, दीपक और जगदेव के मुताबिक राणा हरदेव सिंह के स्वप्न के मुताबिक जब मूर्तियां निकलीं तो उनके साथ ही जमीन से मीठे पानी का चश्मा फूट पड़ा। मां दुर्गा के दृष्टांत को अमली जामा पहनाते हुए राणा हरदेव सिंह ने न केवल मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की बल्कि मंदिर बनाकर प्रतिवर्ष मां दुर्गा की पुण्य स्मृति में ज्येष्ठ मास की अष्टमी को मेले के आयोजन के भी निर्देश  दिए। प्रदेश के अस्तित्व में आने से पूर्व राजा हरदेव सिंह बणिया देवी मेले का आयोजन करवाते थे। साथ निकटवती  क्षेत्रों से कुश्तियों में भाग लेने पहलवान आते। बगीचे में सप्ताहभर उनके ठहरने की व्यवस्था राज दरबार की ओर से होती थी। बणिया देवी मेले का मुख्य आकर्षक कुश्तियां ही होती हैं। मई माह में यह मेला मनाया जाता है। आज भी यह चश्मा मौजूद है।
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