सोलन। सड़न रोग हर साल से सेब की फसल को 720 मिलियन रुपये की चपत लगा रहा है। यही नहीं इस रोग से सेब की तीस से चालीस फीसदी फसल भी प्रभावित हो रही है। यह खुलासा डॉ. यशवंत सिंह परमार उद्यानिकी एवं वानिकी विवि नौणी के पादप रोग निदान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एके गुप्ता ने किया। उन्होंने कहा कि कुछ वर्षों से कोर सड़न रोग सेब की फसल उत्पादन में एक मुख्य समस्या बनकर उभरी है। इस रोग से अधिकतर बागवान त्रस्त हैं। इस बीमारी की वजह से प्रदेश की आर्थिक को लगभग 720 मिलियन रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस बीमारी के कारण न केवल बागवान बल्कि उपभोक्ताओं को भी नुकसान उठाना पड़ता है।
सड़न रोग से न केवल बागवानों को नुकसान हो रहा है बल्कि यह सेहत के लिए भी हानिकारक है। इस रोग से फल में माइकोटाक्सिन आ जाता है। गुलाबी कली अवस्था से पंखुड़ीपात के समय पर बारिश अथवा अधिक नमी इस रोग में फंफूद से संक्रमण फैल जाता है। परागण प्रक्रिया के दौरान मधुमक्खियां और कीड़े फफूंद को फूल के आंतरिक भागों में संक्रमण कर फैला देते हैं। इस मौके पर वैज्ञानिक डॉ. भूपेश कुमार गुप्ता और डॉ. शालिनी वर्मा भी मौजूद रहे।
सड़न रोग के यह हैं लक्षण
रोग ग्रस्त फलों में बीजों के साथ लगने वाले भाग में लगी उल्ली की वृद्धि हो जाती है। संक्रमण बाद में फलों के कोर के साथ लगते गुदे में फैल जाता है। इस रोग की फफूंद फल में सुप्त अवस्था में रहती है। फल में मिठास आने पर सड़न तेज हो जाती है। इस रोग से ग्रसित फलों पर रंग जल्दी आ जाता है तथा पेड़ों से गिरने लगते हैं। फल पर बाहरी लक्षण बहुत ही सूक्ष्म होते हैं तथा जब तक फल को काट नहीं दिया जाता है। भंडारण के दौरान नरम, आंतरिक सड़न के रूप में फसल के बाद गीले कोर रॉट दिखाई देता है।
बागवान ऐसे करें बचाव
सड़न रोग से बचने के लिए सेब के बागीचों में साफ सफाई का ध्यान रखें। पेड़ों की उचित सिधाई एवं कांट छांट करें। बागीचे में अच्छी सूर्य की रोशनी पड़नी चाहिए तथा हवा का प्रवाह भी ठीक से हो। पेड़ों की गुलाबी कली अवस्था पर मैंकोजेब (600 ग्राम) या जिनेब (600 ग्राम) प्रति 200 लीटर पानी का छिड़काव करें। इसके अतिरिक्त अत्यधिक संक्रमण वाले बागीचों में पंखुड़ीपात के समय पर स्कैब और पाउडरी मिल्डयू की रोकथाम के लिए प्रयोग किए जाने वाले फफूंदनाशक, डायफैकोनाजोल (30 मिली) या हैक्साकोनाजोल (100 मिली) प्रति 200 लीटर पानी का छिड़काव लाभकारी है।