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नौणी विवि में डेढ़ सौ वैज्ञानिक पढ़ेंगे शोधपत्र

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नौणी व‌िव‌ि में अायोज‌ित श‌िव‌िर में मौजूद वैज्ञान‌िक। - फोटो : अमर उजाला
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सोलन। डॉ. यशवंत सिंह परमार उद्यानिकी और वानिकी विश्वविद्यालय नौणी में संयंत्र रोग प्रबंधन में जैव तर्क संगत विषय पर आधारित राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हो गई। इसका आयोजन विवि के प्लांट पैथोलॉजी विभाग के सहयोग से भारतीय सोसाइटी ऑफ प्लांट पैथोलॉजिस्ट और हिमालयन फाइटोपैथोलॉजिकल सोसाइटी के तत्वावधान में किया जा रहा है। संगोष्ठी में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के उप महानिदेशक (बागवानी) डॉ. एके सिंह ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की। एडीजी (आईसीएआर) डॉ. पीके चक्रवर्ती विशेष अतिथि के रूप में मौजूद रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता नौणी विवि के उप कुलपति डॉ. एचसी शर्मा ने की। यहां देशभर से करीब 150 वैज्ञानिक पहुंचे हैं।
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मुख्यातिथि ने आजादी के बाद देश को अनाज के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में वैज्ञानिकों की भूमिका की सराहना की। विशेष अतिथि ने खाद्य उत्पादन के नुकसान से संबंधित तथ्यों को साझा किया। डॉ. एचसी शर्मा ने कहा कि जलवायु परिस्थितियों और फसल के पैटर्न में बदलाव, इस क्षेत्र के लिए नई चुनौतियों लाएगा जिन्हें हमें सही ढंग से समझना होगा। रोगजनकों और मेजबान पौधों पर उनका परस्पर प्रभाव को भी समझने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। इस अवसर पर सारणियों की पुस्तक भी जारी की गई। मुख्य अतिथि ने नौणी विवि के वैज्ञानिक डॉ. एसके गुप्ता और डॉ. एचआर गौतम द्वारा फसल रोगों पर लिखी पुस्तक का विमोचन भी किया। हिमालयन फाएटोपथोलोजिकल सोसाइटी ने दुनिया भर में पौध रोग विज्ञान के क्षेत्र में अपने कार्यों के लिए प्रसिद्ध डॉ. सुरेश पांडे और डॉ. टीएस थिंड को सम्मानित किया।

पर्यावरण विषय पर होगी चर्चा
नौणी विवि में अगले दो दिन तक चलने वाली इस संगोष्ठी में 150 वैज्ञानिक और छात्र बीमारी प्रबंधन के पर्यावरण अनुकूल तकनीकों पर विचार-विमर्श करेंगे। अंतिम उपयोगकर्ता के प्रसार के लिए रणनीतियों पर चर्चा करेंगे। इस कार्यक्रम के जरिये किसानों, वैज्ञानिकों और निजी उद्यमियों को एक मंच पर लाने का प्रयत्न किया है।
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इसलिए है संगोष्ठी की आवश्यकता
पादप-रोग उन महत्वपूर्ण कारणों में से एक हैं, जिनका वैश्विक कृषि उत्पादकता पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जलवायु परिवर्तन इस स्थिति को और भी बढ़ा सकता है। पिछले 40 सालों में, खाद्य उत्पादन बढ़ाने में बीमारियों के प्रभावी प्रबंधन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन अभी भी रोगजनक वैश्विक फसल का बड़ा हिस्सा खराब कर देते हैं। जलवायु परिवर्तन, पारिस्थितिक समस्याएं और कीटों की उभरती चुनौतियों ने मिलकर पौधे स्वास्थ्य प्रबंधन को और अधिक जटिल कार्य बना दिया है।
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