मामले की अगली सुनवाई 5 अक्तूबर को
अदालत ने एसआईटी को जांच के दौरान याचिकाकर्ता मनीष कुमार और निजी प्रतिवादी को भी शामिल करने के निर्देश दिए हैं। समिति को भविष्य में परीक्षा प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए दिशा-निर्देश और सुझाव देने की स्वतंत्रता भी दी गई है, ताकि अधिकारियों के निकट संबंधियों के परीक्षा में शामिल होने की स्थिति में हितों के टकराव की आशंका को रोका जा सके। मामले की अगली सुनवाई 5 अक्तूबर को होगी और इसी दिन एसआईटी अपनी रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करेगी।
याचिकाकर्ता ने परीक्षा की पारदर्शिता एवं निष्पक्षता पर उठाया है सवाल
मामला एसपीयू की जेओए आईटी परीक्षा से जुड़ा है, जिसमें विश्वविद्यालय के सेक्शन ऑफिसर एवं नोडल अधिकारी आशीष शर्मा की पत्नी चयनित उम्मीदवारों में शामिल हुई। याचिकाकर्ता मनीष कुमार ने परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई कि नोडल अधिकारी की भूमिका से परिणाम प्रभावित हुआ हो सकता है। हालांकि, एसपीयू के कुलसचिव की ओर से अदालत में नोडल अधिकारी का बचाव करते हुए तर्क दिया गया कि विवि ने पहली बार सीबीटी आयोजित की थी और नोडल अधिकारी की भूमिका केवल प्रशासनिक थी। उन्होंने किसी स्वतंत्र या निजी अधिकार का प्रयोग नहीं किया। विश्वविद्यालय के अनुसार प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षा संचालन, उत्तरों के मूल्यांकन, मेरिट सूची और अंतिम परिणाम तैयार करने की जिम्मेदारी एनएसईआईटी की थी। नोडल अधिकारी की इन प्रक्रियाओं में कोई भूमिका नहीं थी।
दिव्यांग परीक्षार्थी को लेखक नहीं देने के मामले में राज्य चयन आयोग से जवाब तलब
प्रदेश हाईकोर्ट ने एक दिव्यांग परीक्षार्थी को लिखित परीक्षा के दौरान स्क्राइब (लेखक) की सुविधा न देने के मामले में कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने विज्ञापन की शर्त 4(13) और नियम 14(ए) के बीच उत्पन्न समय-सीमा के विरोधाभास और याचिकाकर्ता की शिकायत पर राज्य चयन आयोग के अधिवक्ता को आवश्यक निर्देश प्राप्त करने के लिए कहा है। मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर को होगी। याचिकाकर्ता विश्व पटियाल ने दिव्यांग श्रेणी के तहत परीक्षा में शामिल होने के लिए स्क्राइब की मांग की थी। हालांकि, आयोग की ओर से इस मांग को खारिज कर दिया गया था। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आयोग ने परीक्षा से मात्र 3 दिन पहले (24 मई 2026) वेबसाइट पर एडमिट कार्ड उपलब्ध कराया था, जबकि परीक्षा 27 मई 2026 को आयोजित की गई थी। वहीं आयोग ने हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग (व्यापार एवं प्रक्रिया) प्रथम संशोधन नियम, 2025 के नियम 14(ए) का हवाला देकर स्क्राइब की मांग ठुकरा दी। आयोग का तर्क था कि परीक्षा से 15 दिन पूर्व दिव्यांगता प्रमाण पत्र और 3 संभावित स्क्राइब का ब्योरा देना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता का कहना है कि जब एडमिट कार्ड ही 3 दिन पहले मिला, तो 15 दिन पूर्व आवेदन करना व्यावहारिक रूप से असंभव था। याचिका में विज्ञापन की शर्त संख्या 4(13) का हवाला देते हुए बताया गया कि दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों को एडमिट कार्ड या रोल नंबर प्राप्त होते ही तुरंत केंद्र अधीक्षक के समक्ष स्क्राइब के लिए लिखित आवेदन प्रस्तुत करना था। याचिकाकर्ता ने एडमिट कार्ड डाउनलोड करते ही तुरंत आवेदन किया था।
भारतीय एजुकेशन सोसायटी को राहत
वहीं प्रदेश हाईकोर्ट ने भारतीय एजुकेशन सोसाइटी की ओर से दायर दो अलग-अलग रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की अदालत ने हिमाचल प्रदेश स्कूल शिक्षा बोर्ड और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे शैक्षणिक सत्र 2026-27 (सत्र 2026-28) के लिए पात्र कॉलेजों की सूची में संस्थान का नाम तुरंत शामिल करें। संस्थान को डीएलएड और बीएड पाठ्यक्रमों की चल रही काउंसलिंग प्रक्रिया में प्रोविजनल (अनंतिम) तौर पर भाग लेने की सशर्त अनुमति दी गई है। दोनों पक्षों की सहमति के बाद, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को एनसीटीई अधिनियम, 1993 की धारा 18 के तहत सक्षम प्राधिकारी के सामने 4 सप्ताह के भीतर अपील दायर करने की छूट दी है। यदि अपील 4 हफ्ते में दायर की जाती है, तो उसे समय-सीमा के भीतर ही माना जाएगा और प्राधिकारी गुण-दोष के आधार पर इसका निपटारा करेगा। जब तक सक्षम प्राधिकारी की ओर से अपील पर कोई फैसला नहीं लिया जाता, तब तक हाईकोर्ट की ओर से समय-समय पर दिए गए सभी अंतरिम आदेश प्रभावी रहेंगे। यदि याचिकाकर्ता 4 सप्ताह की समय-सीमा के भीतर अपील दायर नहीं करते हैं, तो उन्हें दी गई यह कानूनी सुरक्षा 4 हफ्ते बाद अपने आप समाप्त हो जाएगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि सत्र 2026-27 के दौरान कोई छात्र इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेता है, तो उसे पहले ही सूचित किया जाएगा कि उसका प्रवेश अपील के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा। गौरतलब है कि यह मामला भारतीय एजुकेशन सोसाइटी की मान्यता रद्द करने से जुड़ा है। एनसीटीई ने धारा 17(1) के तहत भारतीय एजुकेशन सोसाइटी की बीएड, डीएलएड और बीपीएड पाठ्यक्रमों की मान्यता रद्द कर दी थी और 2025-26 सत्र से दाखिले रोकने का फैसला सुनाया था।