उपमंडल शिलाई का मामला, वादी ने लंबे समय से उनकी जमीन पर हस्तक्षेप की उठाई थी मांग
अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने 25 मई 2025 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को ठहराया सही
संवाद न्यूज एजेंसी
नाहन (सिरमौर)। शिलाई क्षेत्र में आबादी देह भूमि को लेकर चल रहे विवाद में अतिरिक्त जिला न्यायालय ने निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश कपिल शर्मा ने माना कि अपीलकर्ताओं की ओर से अंतरिम निषेधाज्ञा (स्टे) के लिए आवश्यक प्रथमदृष्टया साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
मामले में नरेंद्र, धनीराम, जालम सिंह, बीर सिंह और दया राम ने अदालत में दावा किया था कि वे आबादी देह भूमि में अपने हिस्से पर लंबे समय से कब्जे में हैं। उनका आरोप था कि प्रतिवादी ज्ञान चंद व अन्य उनकी जमीन में हस्तक्षेप कर रहे हैं। पेड़ों की शाखाएं काट रहे हैं और घास हटाने का प्रयास कर रहे हैं। इस पर उन्होंने स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की थी। निचली अदालत की ओर से अंतरिम राहत देने से इन्कार किए जाने के बाद मामला अतिरिक्त जिला न्यायाधीश की अदालत में पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि विवादित भूमि के संबंध में स्पष्ट नक्शा, तस्वीरें या ऐसा कोई ठोस दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया, जिससे यह साबित हो सके कि प्रतिवादी वास्तव में हस्तक्षेप कर रहे थे।
अदालत ने आदेश में कहा कि केवल सह-स्वामित्व होने के आधार पर निषेधाज्ञा नहीं दी जा सकती, जब तक यह साबित न हो कि दूसरे पक्ष की कार्रवाई से संपत्ति के उपयोग या मूल्य को वास्तविक नुकसान पहुंच रहा है। अदालत ने यह भी माना कि दोनों पक्षों के कब्जे अलग-अलग बताए गए हैं तथा बीच में दीवार होने का भी उल्लेख रिकॉर्ड में मौजूद है। ऐसे में अंतरिम राहत देने का आधार नहीं बनता। इसके साथ ही अदालत ने 30 मई 2025 को सिविल जज की ओर से दिए गए आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।