किशाऊ बांध परियोजना के खिलाफ जौनसार-बावर में तेज हुआ विरोध
- मुन्ना सिंह राणा ने उठाई व्यापक जनसुनवाई की मांग
-25 से 30 गांवों पर संकट, किशाऊ बांध के खिलाफ जौनसार-बावर में उठी आवाज
संवाद न्यूज एजेंसी
शिलाई (सिरमौर)। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा पर टोंस नदी में प्रस्तावित किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर जौनसार-बावर क्षेत्र में विरोध के स्वर तेज होने लगे हैं। परियोजना से करीब 25 से 30 गांवों के जलमग्न होने और हजारों परिवारों के विस्थापन की आशंका के चलते स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों में चिंता बढ़ गई है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि बांध निर्माण से सदियों पुरानी बसाहटें, उपजाऊ कृषि भूमि, मंदिर और देवस्थल जलमग्न हो जाएंगे। उनका मानना है कि पहाड़ी क्षेत्र की संस्कृति, परंपराओं और कृषि-वानिकी आधारित जीवनशैली का मूल्यांकन केवल भूमि के बाजार मूल्य के आधार पर नहीं किया जा सकता। ग्रामीणों ने पुनर्वास एवं मुआवजा नीति को भी अपर्याप्त बताते हुए बड़े बांध के बजाय छोटे-छोटे तीन बांधों के निर्माण का सुझाव दोहराया है, जिससे विस्थापन को न्यूनतम किया जा सके।
पर्यावरणविदों ने भी हिमालयी क्षेत्र में प्रस्तावित इस विशाल परियोजना को लेकर चिंता जताई है। उनका कहना है कि भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील इस क्षेत्र में बड़े बांध के निर्माण से भूस्खलन, तलछट भराव और नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है, जिससे जैव विविधता को भी नुकसान पहुंचने की आशंका है।
हालांकि सरकार का दावा है कि किशाऊ बांध परियोजना से दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान समेत छह राज्यों को पेयजल उपलब्ध होगा, 660 मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा और यमुना नदी में न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित किया जा सकेगा। सरकार का कहना है कि परियोजना में भूकंपरोधी आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक पुनर्वास नीति अपनाई जाएगी।
इस मुद्दे पर जौनसार-बावर महासभा के अध्यक्ष मुन्ना सिंह राणा ने कहा कि बड़े विकास कार्यों और परियोजनाओं का विरोध होना स्वाभाविक है, क्योंकि उनका सीधा असर स्थानीय लोगों के जीवन पर पड़ता है। उन्होंने कहा, क्वाणु क्षेत्र का अपना विशिष्ट भौगोलिक, सांस्कृतिक और कृषि इतिहास है, जिसे किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं होने दिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करना भी जरूरी है, लेकिन सरकार को बड़े बांधों के साथ-साथ छोटे और कम प्रभाव वाले वैकल्पिक परियोजनाओं पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बना रहे तथा लोगों का विस्थापन न्यूनतम हो।
मुन्ना सिंह राणा ने मांग की कि किशाऊ बांध परियोजना के सभी पहलुओं पर व्यापक जनसुनवाई कर स्थानीय लोगों की भावनाओं और क्षेत्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।