फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पांच साल के बच्चे की तेज बुखार ने ली जान

Thu, 03 Nov 2016 10:40 PM IST
ब्यूराो, नाहन (सिरमौर)।
विज्ञापन
जिला अस्पताल में इलाज के लिए आए मरीज या तीमारदारों की लाइन। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन
नाहन (सिरमौर)। डॉ. वाईएस परमार मेडिकल कॉलेज नाहन में सरकारी उदासीनता मरीजों पर भारी पड़ रही है। वीरवार को अस्पताल में पांच साल के एक मासूम की तेज बुखार ने जान ले ली। हालांकि, अस्पताल में तैनात डॉक्टरों की टीम ने उसे बचाने के भरसक प्रयास किए लेकिन बच्चे की मौत के बाद अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ की कमी खल गई है। अब चर्चा है कि यदि अस्पताल में स्पेशलिस्ट होता तो शायद बच्चे की जान बच जाती।
विज्ञापन


जानकारी के अनुसार पांच साल के एक बच्चे को तेज बुखार आने पर मेडिकल कॉलेज में भर्ती किया गया था। वीरवार को उपचार में जुटी चार सदस्यीय डॉक्टर टीम की उपस्थिति में बच्चे ने केजुअल्टी में दम तोड़ दिया।
बताया जा रहा है कि बच्चे को बुखार के साथ दूसरी बार दौरा भी पड़ा। वहीं, बच्चे को अदरुनी रक्त प्रवाह भी हुआ। नाहन के नया बाजार में बैग का काम करने वाले हरियाणा के साहा निवासी सोहनलाल ने अपने इकलौते बेटे की मौत पर हालांकि अस्पताल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कोई सवाल नहीं उठाया लेकिन उसे मलाल है कि यदि शिशु रोग विशेषज्ञ होते तो शायद उसके बच्चे की जान बच जाती। आर्थिक रुप से काफी तंगहाल सोहनलाल काफी लंबे अरसे से नाहन में ही बैग बनाकर अपने परिवार का गुजर बसर करने में लगा था।
विज्ञापन


उधर, मेडिकल कॉलेज नाहन के कार्यवाहक मेडिकल अधीक्षक डॉ. सुनील कक्कड़ ने बताया कि बच्चे की जान बचाने के लिए डॉक्टर की टीम पूरा प्रयास कर रही थी। उन्होंने बताया कि बच्चे को बुखार था। केजुअल्टी में ही बच्चे को दूसरा दौरा भी पड़ा। उन्होंने बताया कि ऑक्सीजन का भी प्रबंध कर लिया गया था। उन्होंने बताया कि शिशु रोग विशेषज्ञ ज्वाइन करने के बाद छुट्टी पर चल रहे हैं।
बाक्स---
बच्चों का स्वास्थ्य रामभरोसे
डॉ. वाईएस परमार मेडिकल कॉलेज नाहन में बच्चों का स्वास्थ्य रामभरोसे चल रहा है। पहले काफी माह से मेडिकल कॉलेज बच्चों के डॉक्टर की तैनाती के लिए तरसता रहा। अभी हाल ही में चाइल्ड स्पेशलिस्ट की तैनाती भी हुई, लेकिन डॉक्टर साहब ज्वाइनिंग लेते ही छुट्टी पर चले गए। ऐसी हालत में बच्चों के अभिभावकों को दूसरे अस्पतालों में इलाज के लिए बाधित होना पड़ रहा है।  
विज्ञापन


 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें