वन तस्करी मामले में न्यायालय का फैसला, पंजीकृत मालिक को सुनवाई का मौका और डीएफओ को दोबारा आदेश पारित करने के निर्देश
पंजीकृत मालिक को नोटिस न देना अदालत ने माना कानूनी खामी, 29 जून को होगी अगली सुनवाई
दीपक मेहता
नाहन (सिरमौर)। वन तस्करी से जुड़े एक मामले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) नाहन की ओर से वाहन जब्त करने के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि किसी वाहन को जब्त करने से पहले उसके पंजीकृत स्वामी को नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का अवसर देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इस प्रक्रिया का पालन न होने पर जब्ती आदेश टिक नहीं सकता।
दरअसल, वन विभाग ने आरोप लगाया था कि सुपर कैरी वाहन का इस्तेमाल अवैध रूप से खैर की लकड़ी के परिवहन में किया गया था। जांच के दौरान वाहन को जब्त कर राज्य के पक्ष में कुर्क करने का आदेश पारित किया गया था। इसके खिलाफ चालक एवं अपीलकर्ता मंदीप कश्यप ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि वाहन का सेल सर्टिफिकेट सुनील कुमार के नाम पर जारी है और वही वाहन का वास्तविक पंजीकृत स्वामी है। इसके बावजूद अधिकृत अधिकारी ने न तो उन्हें नोटिस जारी किया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर दिया।
अदालत ने माना कि भारतीय वन अधिनियम के तहत ऐसी कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है और बिना नोटिस के वाहन जब्ती का आदेश वैध नहीं माना जा सकता। अदालत ने 8 जनवरी 2026 को पारित जब्ती आदेश को रद्द करते हुए पूरा मामला दोबारा अधिकृत अधिकारी एवं डीएफओ के पास भेज दिया है। निर्देश दिए गए हैं कि वाहन के नामित स्वामी को विधिवत नोटिस देकर उसकी आपत्तियां सुनी जाएं और उसके बाद कानून के अनुसार नया फैसला लिया जाए। न्यायालय ने सभी संबंधित पक्षों को 29 जून को अधिकृत अधिकारी के समक्ष उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद सुनवाई पूरी कर नए सिरे से निर्णय लिया जाएगा।
यह है पूरा मामला
8-9 सितंबर 2023 की रात कालाअंब थाना पुलिस ने मोगीनंद के पास एक गाड़ी में बिना वैध दस्तावेजों के खैर के 3 लट्ठे अवैध रूप से ले जाते हुए पकड़े थे। पुलिस ने खैर के लट्ठों के साथ उक्त गाड़ी को जब्त कर वन कर्मचारियों की सुपुर्दगी में सौंप दिया था। पुलिस की जांच में बाद में यह भी सामने आया था कि इन्होंने पहले भी खैर और अन्य पेड़ काटे थे जो पंजाब की एक फैक्टरी में बेचे गए थे।