पांवटा साहिब(सिरमौर)। रविवार को पांवटा के यमुनाघाट पर छठ पर्व की खूब धूम रही। पड़ोसी राज्यों के हजारों परिवार सिरमौर के औद्योगिक इकाईयों, खनन माइनों समेत विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत है। इसलिए पिछले एक दशक से पांवटा में भी पूर्वांचल राज्यों के हजारों श्रद्धालुगण छठ पर्व को पूरे धूमधाम से मना रहे हैं।
बता दें कि छठ पर्व देश के बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश व पड़ोसी देश नेपाल में पूरे हर्षोल्लास व निष्ठा से मनाते हैं। सिरमौर में भी हजारों परिवारों ने छठ पर्व मनाया। मान्यता है कि महापर्व में देवी षष्ठी माता व भगवान सूर्य को प्रसन्न करने को स्त्री-पुरुष दोनों ही 4 दिनों तक व्रत रखते हैं। पहले दिन यानी चतुर्थी को आत्म शुद्धि हेतु व्रत करने वाले केवल अरवा खाते हैं जो शुद्ध आहार होता है। पंचमी के दिन नहाय खाय होता है, यानी स्नान करके पूजा पाठ करके संध्या काल में गुड़ व नये चावल से खीर बनाकर फल और मिष्ठान से छठी माता की पूजा होती है। फिर व्रत करने वाले कुमारी कन्याओं व ब्राह्मणों को भोजन करवा, खीर को प्रसाद के तौर पर खाते हैं।
षष्ठी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाते हैं। जो संध्या के समय पकवानों को बड़े बडे बांस के डालों में भरकर जलाशय के निकट यानी किसी पवित्र नदी, तालाब, सरोवर पर ले जाया जाता है। नदी या जलाशयों में ईख का घर बनाकर उनपर दीया जलाया जाता है। व्रत करने वाले जल में स्नान कर इन डालों को उठाकर डूबते सूर्य एवं षष्ठी माता को अर्घ्य देते हैं। सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने अपने घर वापस आ जाते हैं।
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ये रही है मान्यता...
राम स्वरुप, शेखर, हरि सिंह, कल्पना, रेखा, हीरा सिंह, किशनपाल व देवेंद्र का कहना है कि पर्व के विषय में मान्यता यह है कि जो भी षष्ठी माता व सूर्य देव से इस दिन कुछ भी मुराद मांगते हैं वह पूरी होती है। कोई मुराद पूरी होने पर बहुत से लोग सूर्य देव को दंडवत प्रणाम करते हैं। सूर्य को दंडवत प्रणाम करने का व्रत बहुत ही कठिन होता है। लोग अपने घर में कुल देवी या देवता को प्रणाम कर नदी तट तक दंड देते हुए पहुंचते हैं।