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गिरिपार क्षेत्र में धूमधाम से शुरू हुआ बूढ़ी दिवाली पर्व

Wed, 30 Nov 2016 11:49 PM IST
ब्यूरो ,अमर उजाला सतौन(सिरमौर)।
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सतौन (सिरमौर)। गिरिपार क्षेत्र में मंगलवार से बूढ़ी दिवाली बड़े जोर शोर से मनाई जा रही है। यह मशराली, बूढ़ी दिवाली, दिआली या मशराली कबायली संस्कृति का जीता जागता प्रमाण है। गिरिपार इलाके में इस त्योहार को सामान्य दीपावली के ठीक एक महीने बाद (3 से 7 दिनों तक) बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।

कहा जाता है कि भगवान रामचन्द्र के वनवास से लौटने के बाद खुशी में नागरिकों ने घी के दीप जलाए और खुशियां मनाई। उसी परंपरानुसार आज भी पहाड़ी क्षेत्रों में दिवाली मनाई जाती है। एक मान्यता यह है कि इस क्षेत्र में महाभारत काल की सभ्यता दिखाई देती है, और ‘बूढ़ी दिवाली’ नाम बुड़ा नृत्य के कारण पड़ा।
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दिवाली के पहले दिन को जिसे छोटी अमावस्या या मावस या ‘रूदियाला’ कहा जाता है। जिस तरह होलिका जलाई जाती है, उसी प्रकार एक ‘डाह’ नामक लकड़ियों का ढेर बनाया जाता है। ग्रामीण गांव के बाहर जा कर ‘बलराज’ को जलाते है। इस अवसर पर ढोल, करनाल, दुमानू, हुड़क आदि बाजे बजाते हुए जाते हैं और बच्चे और नौजवान ‘जले बलराज’ कह कर ‘डाह’ को जलाते हैं। अगले दिन को अमावस्या होती है और इस दिन विशेष जाति के लोग सफ़ेद रंग की पोशाक जिस पर रंगीन फूल कढ़े होते हैं, इसे ‘चोलौं, पहन कर बुड़ा नृत्य करते हैं, और हुड़क बजाते हैं। लोग सुबह-सुबह गांव के सबसे सम्मानित व्यक्ति की सेवा गाता है और उसके घर में अखरोट देता है, जिसके बदले मालिक उसे उपहार स्वरूप मूढ़ा, पैसे आदि देता है।

 इस अवसर पर मुख्यत: हारूल गाई जाती है। दिन में रासे लगाए जाते हैं, और रात को घरों, खलिहान और यंत्रों पर दीप जलाए जाते हैं।
तीसरा दिन ‘पड़वा’ या ‘भिउरी’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन देवता के यहां पूजा होती है, और बैलों को अनाज दिया जाता है। बैलों के सीघों में तेल लगाया जाता है। इस अवसर पर घरों में नाना प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं, जैसे मूढ़े, साकुली, सीड़ों, गुलगुले आदि। दिवाली पर मेहमानों का आना-जाना अधिक होता है, खासतौर पर दिवाली में लडकियां अपने मायके आती है, और उन्हें उनका दिवाली का हिस्सा दिया जाता है, जिसमें मूढ़ा और अखरोट दिया जाता है। इस अवसर पर ‘भिउरी’ गाई जाती है, जो बहुत ही मार्मिक होती है ।
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हाटी कबायली संस्कृति में त्यौहारों के अनुसार बाद्ययंत्र बजाए जाते हैं और बूढ़ी दिवाली में बुड़ो या बुडिय़ाच संगठन का आयोजन होता है तो केवल हुलक या हुड़क ही बजाया जाता है और उसकी ताल पर बुडय़ाच गांव के बाहर जांघि (परकोटा) के मुख्य द्वार पर ग्राम देवता की स्तुति करते हैं जिसे सेवा गायन कहा जाता । बूढ़ी दिवाली का समापन यह गाना लगाकर किया जाता है ‘सदा रोई चेई ऐशिए’ अर्थात सदा ऐसा ही रहे।
 
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