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बागवानों के हित के लिए कोई राजनीतिक दल नहीं आया आगे

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अमर उजाला ब्यूरो
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राजगढ़ (सिरमौर)। लोकसभा चुनाव के बाद बनने वाली सरकार से बागवानों को क्या उम्मीदें हैं? अब तक रही सरकारों ने बागवानों के हितों के लिए क्या किया? क्या है बागवानी क्षेत्र से जुड़ी समस्याएं। इसको लेकर राजगढ़ में इलाके के बागवानों के साथ अमर उजाला का चुनावी संवाद हुआ। संवाद में बागवानों से जुड़ी कई समस्याएं सामने आईं। बागवानों का कहना है कि अब तक की जो भी सरकार रही, बागवानों के हितों के लिए खास कदम नहीं उठाए गए।

बागवानों ने कहा कि कभी पीच वैली के नाम से मशहूर राजगढ़ इलाके से अब आड़ू की फसल गायब होने लगी है। हैरत की बात तो यह है कि फलों की पैदावार में मुख्य फसल होने के बावजूद बागवानों को इसका समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा। निम्म गुणवत्ता का आड़ू कोई नहीं खरीदता। बागवान ऐसी पैदावार या तो फेंक देते हैं या फिर जमीन में ही दबा देते हैं। बागवानों का कहना है कि आड़ू की पैदावार के बाद उसके विपणन से संबंधित कई समस्याएं हैं। फसल तैयार होने के बाद उसे बाजार पहुंचाने में देरी हुई तो फसल खराब हो जाती है। इलाके में अब तक की सरकार ने न तो किसी कोल्ड स्टोर की व्यवस्था की और न ही कोल्ड वैन का प्रबंध हुआ, जिससे आड़ू की फसल को ज्यादा दिन बाद भी बाजार में बेचा जा सके। सब्जी मंडी में आड़ू पहुंचने के बाद भी उन्हें बेहतर दाम नहीं मिल पाते।
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बिचौलिए डकार जाते हैं गाढ़ी कमाई
बिचौलिए बागवानों की गाढ़ी कमाई को डकार जाते हैं। बागवानों का कहना है कि आड़ू, सेब, कीवी, खुमानी आदि की नई प्रजातियां इजाद की जानी चाहिए। सेब की अपेक्षा अन्य तमाम फलों की नई वैरायटी विभाग इजाद नहीं कर पा रहा। सेब को अधिक तवज्जो दी जा रही है। जबकि आड़ू खत्म हो रहा है। 70 के दशक से यहां आड़ू की फसल तैयार की जा रही है लेकिन, अब इसकी पैदावार में 50 फीसदी से अधिक कमी दर्ज की जा रही है। आड़ू की जगह लोग सेब लगा रहे हैं। कुछ साल पहले आड़ू की फसल को लगी फ्लाइटो प्लाजमा नामक बीमारी की रोकथाम के भी उपाय नहीं खोजे जा सके। इस वजह से कई बागवानों के पूरे बगीचे तबाह हो गए हैं।
सेब की ओर बढ़ने लगा रुझान
सिरमौर जिले में सेब, आड़ू, प्लम, खुमानी, कीवी आदि फलों की पैदावार की जाती है। जिले में 15163 हेक्टेयर भूमि पर फलों की पैदावार होती है। इसमें हर साल करीब 25600 मीट्रिक टन फलों का उत्पादन होता है। बागवानी में आड़ू यहां की मुख्य फसल है। 50 प्रतिशत से अधिक लोग आड़ू की फसल पर निर्भर हैं। जबकि, पिछले कुछ वर्षों से लोग सेब की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। जिले के ऊंचे इलाकों में सेब बड़े पैमाने पर तैयार हो रहे हैं।

1. फागू गांव के विनोद कुमार का कहना है कि दवाइयों और उपकरणों पर मिलने वाली सब्सिडी सेब में अधिक है, जबकि अन्य फलों पर कम। आड़ू सिरमौर की पुरानी प्रजाति है। यहां नई प्रजाति को इजाद करने के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए। परिणामस्वरूप आड़ू की पैदावार लगातार घट रही है। वैज्ञानिक शोध से नई प्रजाति लाई जानी चाहिए। नेक्ट्रीन की नई प्रजाति आई तो है, लेकिन इसके बाजार में सही भाव नहीं मिल पा रहे।
2. भुईरा के अमित ने कहा कि आड़ू यहां की मुख्य फसल रही है। राजगढ़ पीच वैली के नाम से मशहूर है लेकिन, फ्लाइटों प्लाजमा नामक रोग लगने से कई लोगों के बगीचे तबाह हो गए हैं। इस रोग पर काबू पाने के लिए विभाग कुछ नहीं कर पा रहा। पत्ते लाल पड़ने के बाद आड़ू के पौधे सूख रहे हैं।
3. छोगटाली के रमेश कुमार ने कहा कि बागवानों की आज तक किसी ने नहीं सुनी। आड़ू, प्लम या अन्य फलों की अपेक्षा सेब को अधिक तरजीह दी जा रही है। सेब की तर्ज पर आड़ू की भी नई प्रजातियां आनी चाहिए। लोग सेब के बगीचे लगा रहे हैं। सेब की फसल के लिए भी विपणन की उचित सुविधा नहीं है।
4. टिक्कर के रविदत्त शर्मा का कहना है कि सेब, आड़ू और अन्य फलों के लिए फसल बीमा योजना का कोई फायदा नहीं है। मौसम या बीमारी की वजह से फसलों को नुकसान होने पर मिलने वाला मुआवजा नाममात्र है। जबकि, इसके लिए प्रीमियम अधिक देना पड़ता है। विभाग हेक्टेयर में पौधों के हिसाब से मुआवजा देता है। यह मापदंड पहाड़ी क्षेत्र में फिट नहीं बैठते।
5. छोगटाली के देश राज ठाकुर ने कहा कि बागवानों की आर्थिकी को मजबूत करने के लिए सरकार को कदम उठाने की जरूरत है। फलों की नई-नई प्रजातियां इजाद करनी चाहिए। जबकि, किसानों को नई प्रजातियों के संदर्भ में जानकारी देने के लिए ग्रामीण स्तर पर शिविर लगाए जाने चाहिए।
6. डिमर के सुदर्शन ठाकुर का कहना है कीवी की पैदावार को बढ़ावा देने के भी अब तक किसी सरकार ने ठोस प्रबंध नहीं किए। उन्होंने कीवी के 50 से 60 पेड़ लगाए हैं। लेकिन, पोलीनाइजर के लिए दिक्कत हो रही है। पोलीनाइजर प्रजाति की कीवी नहीं मिल रही। विभाग को इस दिशा में लोगों की मदद करनी चाहिए।
7. भानत गांव के सुरेंद्र तोमर ने बताया कि आड़ू की फसल इलाके में पिछले 70 सालों से हो रही है। तब से लगकर अब तक फसल तैयार करने के लिए होने वाले खर्चे में 50 प्रतिशत तक इजाफा हुआ है लेकिन, किसानों को आड़ू के वहीं पुराने दाम मिल रहे हैं। समर्थन मूल्य कुछ भी नहीं है। ब्री ग्रेड आड़ू फेंकना पड़ता है। उसका कोई खरीदार जहीं मिलता।
8. चोकर गांव के राकेश ने बताया कि बागवानों को मार्केटिंग के बारे में सही जानकारी नहीं है। सब्जी मंडी में आड़ू के सही दाम नहीं मिल पा रहे। बिचौलियों के माध्यम से फलों की बिक्री पर बागवानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। सरकार को मार्केटिंग के लिए कोई ऐसी नीति बनानी चाहिए जिससे बागवान बिचौलियों पर निर्भर न रहें।
9. दीदग के अरुणू चौहान ने बताया कि आड़ू की फसल तैयार होने के बाद ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाती। एक दिन भी देरी हुई तो फसल बर्बाद हो जाती है। इलाके में न तो कोई कोल्ड स्टोर है और न ही कोल्ड वैन की सुविधा। इस वजह से बागवानों को फसल के उचित दाम नहीं मिल पाते।
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10. सैर पंचायत के अर्जुन मेहता का कहना है कि नई फलों की पैकिंग, ट्रांसपोर्टेशन महंगी हो रही है। लेकिन, फसल के उचित दाम नहीं मिल पा रहे। फल दिल्ली भेजने पर आढ़ती जो दाम देते हैं, वही मानने पड़ते हैं। विपणन की व्यवस्था में सुधार कर बागवानों को बिचौलियों के हाथों लुटने से बचाने के लिए ठोरी नीति बनाने की जरूरत है। लेकिन, किसी सरकार ने इसकी पहल नहीं की।
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