जौनसार में मशाल यात्रा के साथ बूढ़ी दिवाली का आगाज
बलिराज का पुतला जलाते ही शुरू हो गया पर्व
सैकड़ों लोगों ने निकाली मशाल यात्रा
अमर उजाला ब्यूरो
शिलाई (सिरमौर)। गिरिपार क्षेत्र के साथ बाबर जौनसार में बूढ़ी दिवाली का पर्व शुक्रवार रात को धूमधाम से शुरू हो गया। देर रात लोगों ने मशाल यात्रा निकाली जो निर्धारित स्थल पर पहुंच कर संपन्न हुई। यहां बलिराज का पुतला जलाया गया। इस मौके पर सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे। इसी के साथ शनिवार को कई जगहों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जहां लोगों ने नाच-गाकर बूढ़ी दिवाली की खुशियां मनाईं। गौरतलब है कि गिरिपार क्षेत्र में अलग-अलग गांवों में तीन से सात दिनों तक बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। रविवार को गांव की अविवाहित लड़कियां भियुरी गीत गाती हैं। इसमें भियुरी की माता पूछती हैं कि गांव की सभी लड़कियां तो मायके आ गईं मेरी भियुरी क्यों नहीं आई? ऐसी माना जाता है कि भियुरी मायके आते समय खाई में गिरकर मर गई थी। इस मौके पर भियुरी गीत भी गाया जाता है लेकिन कोई वाद्य यंत्र नहीं बजता। गांव की सभी महिलाएं रवाहीणो गेहूं से बने मुड़े, चावलों से बनी शाकुली, धान से बनाई चिवड़ा, अखरोट, भंगजीरा बांट कर एक-दूसरे के साथ इसका सेवन करते हैं।
सिमटता जा रहा बूढी दिवाली का पर्व
जिले में बूढ़ी दिवाली और माघी का त्योहार प्रमुख है। पहले बूढ़ी दिवाली का पर्व हर गांव में सात दिन तक मनाया जाता था लेकिन पाश्चात्या संस्कृति के रंग में रंगे लोग अब इस प्राचीन त्योहार से दूर हो रहे हैं। कुछ ही गांवों में अब यह पर्व सात दिन तक मनाया जाता है। अधिकतर गांवों में यह पर्व दो ही दिन चलता है। इसका मुख्य कारण पाश्चात्य संस्कृति के साथ-साथ संयुक्त परिवारों का टूटना भी माना जा रहा है।