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...यहां हर साल जौ समान बढ़ता है शिवलिंग का आकार

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महाशिवरात्रि स्पेशल........
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यहां हर साल जौ समान बढ़ता है शिवलिंग का आकार
पौड़ीवाला महादेव मंदिर में रावण ने अमरता के लिए बनाई थी स्वर्ग की दूसरी सीढ़ी
मृकंडु ऋषि ने पुत्र प्राप्ति के लिए यहीं की थी घोर तपस्या
अमर उजाला ब्यूरो
नाहन (सिरमौर)।
सिरमौर जिला मुख्यालय नाहन के समीप पौड़ीवाला शिवमंदिर देश के प्राचीन मंदिरों में शुमार है। इसका इतिहास लंकाधिपति रावण से जुड़ा है। महाज्ञानी, विद्वान और शक्तिशाली होने के बावजूद लंकापति रावण अमरता चाहता था। घोर तपस्या के बाद भगवान शिवशंकर ने रावण को अमर होने का राज बताया। जनश्रुति है कि शिव शंकर के कहे अनुसार अमरता प्राप्त करने के लिए रावण ने पहली पौड़ी हरिद्वार के हरकी पौड़ी (सीढ़ी), दूसरी पौड़ी पौड़ीवाला, तीसरी पौड़ी चूड़ेश्वर महादेव और चौथी पौड़ी किन्नर कैलाश में बनाई। लेकिन, इसके बाद रावण इतना थक गया कि नींद आ गई। जब वह जागा तो सुबह हो गई थी। ऐसे में रावण अमरता प्राप्त करने के वरदान से वंचित रह गया। पौड़ीवाला स्थित इस जगह में आज भी दूसरी पौड़ी विद्यमान है। कहा जाता है कि यह कहानी उस समय की है, जब श्रीराम अयोध्या के राजा बनने वाले थे। उसी दौरान रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए यहां शिवलिंग की स्थापना की। यह कोई आम शिवलिंग नहीं है। मान्यता है कि इसका आकार हर साल जौ के समान बढ़ता है। यही कारण है कि यह शिवलिंग श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र है। यहां एक प्राचीन बावड़ी भी है, जो हर समय पानी से लबालब रहती है। कहते हैं कि पौड़ीवाला स्थित शिवमंदिर में साक्षात शिव शंकर भगवान वास करते हैं और यहां आने वाले हर श्रद्धालु की मनोकामना पूर्ण करते हैं। यहां हर साल महाशिवरात्रि पर मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु मनोकामना लेकर भारी संख्या में पहुंचते हैं। पौड़ीवाला शिवधाम हिमाचल के साथ-साथ पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के लोगों का भी आस्था का मुख्य केंद्र है।
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मार्कंडेय ऋषि को मिला था अमरता का वरदान
एक अन्य कथा के अनुसार मृकंडु ऋषि ने पुत्र प्राप्ति के लिए विष्णु भगवान की तपस्या की। विष्णु भगवान की तपस्या से प्रसन्न होकर ऋषि को पुत्र का वरदान देते हुए कहा कि पुत्र की आयु केवल 12 वर्ष की होगी। अत: इस वरदान के फलस्वरूप मार्कंडेय ऋषि का जन्म हुआ, जिन्होंने अमरता प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की तपस्या में निरंतर महा मृत्युंजय मंत्र का जाप किया। 12 वर्ष की आयु होने पर जब यमराज उन्हें लेने आए तो उन्होंने बोहलियों स्थित शिवलिंग को अपनी बाहों में भर लिया। तत्पश्चात, शिव शंकर स्वयं वहां प्रकट हुए और उन्होंने मार्कंडेय ऋषि को अमरता का वरदान दिया। इसी पावन स्थल से मारकंडा नदी का उद्गम हुआ। बताया जाता है कि अमरता प्रदान के उपरांत शिव शंकर पौड़ीवाला में स्थित शिवलिंग में समा गए।
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