अमर उजाला ब्यूरो
संगड़ाह (सिरमौर)।
महत्वाकांक्षी रेणुका बांध परियोजना के निर्माण कार्य को लेकर एचपीपीसीएल अभी तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाया है। पिछले करीब दो दशक से अधिक समय से दिल्ली दरबार में हाजिरी लगा रहा है, लेकिन इतना लंबा समय बीतने के बाद भी ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया है। बांध प्रबंधन बांध निर्माण को लेकर तकरीबन सभी औपचारिकताएं पूर्ण कर चुका है। निर्माण के लिए बजट न मिलने से सारा कार्य अधर में लटका पड़ा है।
2016 में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप करने के बाद बांध प्रबंधन को 447 करोड़ की राशि प्राप्त हो चुकी है, जिसमें से आधे से अधिक राशि विस्थापितों को वितरित की जा चुकी है। बांध प्रबंधन द्वारा अभी तक विस्थापित होने वाले परिवारों को सिर्फ जमीन का मुआवजा दिया गया है लेकिन उनके जीवन यापन करने के लिए अभी तक विभाग व सरकार द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया है। वहीं बांध निर्माण की लागत भी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। बांध निर्माण की लागत मात्र 1382.54 करोड़ थी। 2006 में यह लागत बढ़कर 3900 करोड़ तक पहुंची। मौजूदा समय में यह लागत कई गुणा बढ़कर 5300 करोड़ पर पहुंच गई है।
संघर्ष समिति के अध्यक्ष योगेंद्र कपिला, संयोजक प्रताप तोमर, महासचिव संजय चौहान, पूर्णचंद शर्मा, धर्मचंद शर्मा, प्रेम शर्मा ने आरोप लगाते हुए कहा कि कई वर्ष पूर्व पर्यावरण को लेकर जनसुनवाई की गई जिसमें लोगों के परामर्श तोड़ मरोड़ कर पेश किए गए। बांध निर्माण की लागत लगातार बढ़ती ही जा रही है जो अब बढ़कर चार गुणा हो चुकी है।
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एक स्थान पर बैठक संभव नहीं
एचपीपीसीएल के उप महाप्रबंधक रामपाल शर्मा ने बताया कि पूरा डूब क्षेत्र दो भागों में बंटा होने और लंबा क्षेत्र होने के कारण एक स्थान पर बैठक करना संभव नहीं है। यदि लोगों की राय के बारे पहले पता चलता तो उनकी सहूलियत के अनुसार बैठक का आयोजन किया जाता।
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