प्रवासी बच्चों के सहारे चल रहे सरकारी स्कूल
स्थानीय बच्चों की अपेक्षा प्रवासी बच्चों की संख्या अधिक
स्कूल नहीं जा रहे प्रवासी मजदूरों के 20 फीसदी बच्चे
अमर उजाला ब्यूरो
कालाअंब (सिरमौर)।
निजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने के प्रचलन के कारण सरकारी स्कूल प्रवासी बच्चों के भरोसे चल रहे हैं। औद्योगिक क्षेत्र कालाअंब के अंतर्गत आने वाले विभिन्न स्कूलों में प्रवासी मजदूरों के बच्चों की संख्या काफी अधिक है। जबकि 20 फीसदी प्रवासी बच्चे स्कूल ही नहीं जा रहे हैं। ऐसे बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। लिहाजा, प्रवासी बच्चों को शिक्षा मुहैया करवाने के साथ-साथ सरकारी स्कूलों में स्थानीय लोगों के बच्चों की संख्या बढ़ाने पर भी शिक्षा विभाग को जोर देना होगा।
औद्योगिक क्षेत्र के मोगीनंद-1 और मोगीनंद-2 विद्यालय में कुल 323 विद्यार्थी हैं जिनमें 50 प्रतिशत प्रवासी बच्चे हैं। कालाअंब स्कूल में कुल 349 में से 80 प्रतिशत, नागल-सकेती में कुल 120 विद्यार्थियों में 20 प्रतिशत, रामपुर जाटान में कुल 160 विद्यार्थियों में 60 प्रतिशत, जोहड़ों स्कूल में कुल 93 विद्यार्थियों में 70 प्रतिशत तथा खैरी प्राथमिक विद्यालय में कुल 141 विद्यार्थियों में 90 प्रतिशत प्रवासी बच्चे शिक्षा का लाभ उठा रहे हैं।
मोगीनंद-1 के सीएचटी राजकुमार तथा राप्रापा खैरी के सीएचटी ऋषिपाल ने बताया कि स्कूल स्टाफ प्रतिवर्ष होम विजिट करता है। साथ ही झुग्गी झोपड़ी वालों की बस्तियों में भी जाकर लोगों को जागरूक किया जाता है। कई दाखिले मौके पर भी किए जाते हैं।
उन्होंने बताया कि क्षेत्र में सभी प्राथमिक स्कूल प्रबंधन चाहते हैं कि सभी बच्चों तक शिक्षा पहुंचे लेकिन कुछ प्रवासी मजदूर मजबूरन और कुछ लोग किसी अन्य कारण से बच्चों को स्कूल नहीं भेज पा रहे। इसमें मजदूर वर्ग के बच्चे ज्यादा शामिल हैं। प्रवासी मजदूरों के सारे बच्चे शिक्षा ग्रहण नहीं कर पा रहे। इसका मुख्य कारण मजदूरों का एक जगह स्थायी कामकाज न होना बताया जा रहा है। यदि सभी को स्कूल पहुंचाया जाए तो इनकी संख्या में और इजाफा हो सकता है। प्रवासी मजदूर सुरेंद्र, बाबूलाल, रेशम सिंह, बलवान व गुल्लू ने बताया कि वे अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं लेकिन उनके सामने कई तरह की समस्याएं पेश आ रही हैं। एक जगह स्थायी रूप से न रह पाने के कारण यह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।
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--संजय गुप्ता