संगड़ाह (सिरमौर)। जिला मुख्यालय से 72 किलोमीटर दूर स्थित है संगड़ाह पंचायत का एक गांव है सियूं। यहां विकास के नाम पर न तो एक ईंट लगी और न लग सकती है। रेणुका बांध के लिए विस्थापित हुए दर्जनों गांवों की यह स्थिति है। भू-अधिग्रहण होने के बाद पुनर्वास के नाम पर सिर्फ जमीन के टुकड़े खरीदे गए। विद्रूप यह है कि इस बारे में किसी भी राजनीतिक दल ने अभी तक आवाज नहीं उठाई।
हालात यह है कि वर्तमान में जहां ग्रामीण रह रहे हैं, वह अब उनका अपना नहीं है। भू अधिग्रहण अधिनियम की सेक्शन चार लगने से वहां कोई कार्य नहीं हो रहे। विकासात्मक कार्यों पर फुलस्टॉप लग गया है। ग्रामीण नई जगह पर बस नहीं पा रहे और पुरानी जगह पर सुविधाएं नहीं मिल रही। परियोजना से कुल 1142 परिवार विस्थापित होंगे। लगभग 25 पंचायतों के लोग विस्थापित होंगे। इनमें करीब आधा दर्जन ऐसे गांव है जो 90 से 100 प्रतिशत तक उजड़ेंगे।
1994 में परियोजना के लिए हिमाचल, दिल्ली और हरियाणा सरकार के बीच एमओयू साइन हुआ था। विस्थापितों के लिए सैनवाला, चाकली, अंबोया और टोकियो में जमीनें खरीदी गई हैं लेकिन यहां पर पुनर्वास नहीं हो रहा। सियूं गांव को ही लें तो पूरा गांव एक टापू की भांति है। गांव में एक ओर पालर खड्ड है तो एक ओर गिरि नदी। बरसात में चारों ओर पानी आने के कारण यह गांव जिला मुख्यालय ही नहीं उपमंडल मुख्यालय से भी कट जाता है। लोग अपनी जान जोखिम में डालकर सफर करने को विवश हैं।
सियूं, निचला भलटा, बयालग, मलाहन टयूरी, पनयाली, शेऊबाग, मझाई आदि गांव की यही स्थिति है। बिजली, पानी, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं यहां पर वही है जो वर्ष 2008 से पहले की थी। नई योजना बन नहीं पा रही।
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यह पंचायतें होंगी विस्थापित
रेणुका बांध के लिए दीद बगड़, कोटला मोलर, पनार, लाणा-पलटा, पराड़ा, नैरी नावन, डिंबर, सैर तंदुला, काथली भरण, गवाही, संगड़ाह, रेडली, जरग, बाउनल काकोग, माइना गढेल, जाम्मू कोटी, रजाणा, ददाहू, खाला क्यार, बिरला, कटाह शीतला, पंजाहल, थाना कसोगा, कांडो कांसर, अंधेरी पंचायतें विस्थापित होगी।
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क्या कहते हैं अधिकारी
रेणुका बांध परियोजना के महाप्रबंधक एसएल डोगरा ने बताया कि विस्थापितों से ऑप्शन ली जा रही है कि मकान बनाकर चाहिए या वह स्वयं बनाएंगे। पुनर्वास में उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी, जो डेम क्षेत्र में आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि पुनर्वास की प्रक्रिया जारी है।