राजधानी शिमला के लिए कभी जीवनदायिनी रही अश्वनी खड्ड आज सबसे ज्यादा दूषित मानी जाती है। वर्ष 2007 में पीलिया फैलने के बाद राज्य सरकार ने मल्याणा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट से खड्ड में गिरने वाले गंदे पानी को रोकने के लिए एक करोड़ की सीवेज डायवर्जन योजना बनाई थी लेकिन 18 साल बाद भी यह योजना कागजों से बाहर नहीं निकल पाई है। इस कारण क्वालग पेयजल योजना भी 11 साल से बंद पड़ी है।
सूचना के अधिकार के तहत 2007 में शहर में फैले पीलिया और हैजा की जांच रिपोर्ट में यह जानकारी मिली है। शहर के मल्याणा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से निकल रहा पानी अश्वनी खड्ड में मिलने से कवालग पेयजल परियोजना में मिल रहा था। वर्ष 2007 में शिमला में पीलिया फैलने का यही मुख्य कारण रहा था। इसके बाद योजना बनाई थी कि सीवरेज प्लांट से निकलने वाले उपचारित पानी को कवालग से आगे अश्वनी खड्ड में छोड़ा जाएगा लेकिन यह योजना अभी तक सिरे नहीं चढ़ पाई है।
इस वजह से 20 करोड़ से बनी क्वालग पेयजल योजना अभी तक बंद पड़ी है। वहीं वर्तमान में शिमला शहर हर साल पानी की किल्लत झेल रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि शिमला शहर को प्रतिदिन 2 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रति दिन) स्वच्छ पेयजल देने की क्षमता रखने वाली 20 करोड़ की लागत से बनी क्वालग पेयजल योजना 10 सालों से बंद है। वर्ष 2015 में दोबारा शहर में पीलिया फैलने के बाद इस योजना को पूरी तरह बंद कर दिया था। आज यह परियोजना खंडहर में तब्दील हो चुकी है, जबकि शहर पानी के संकट से जूझ रहा है।
अश्वनी खड्ड सबसे दूषित
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक अश्वनी खड्ड प्रदेश की सबसे दूषित खड्ड है। शिमला का सीवेज ट्रीटमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर (ढांचा) आज भी काफी पुराना है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि प्रदेश में प्रतिदिन 210.5 मिलियन लीटर सीवेज पैदा हो रहा है, जबकि एसटीपी की क्षमता केवल 119.5 एमएलडी है। इसका सीधा असर नदियों पर पड़ रहा है। अश्वनी खड्ड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वहीं कैग की रिपोर्ट के अनुसार 2016 से 2021 के बीच हिमाचल में 12.94 लाख जलजनित रोगों के मामले दर्ज किए हैं। शिमला जो कभी अपने साफ पानी के लिए जाना जाता था आज बार-बार जलजनित बीमारियों का केंद्र बन गया है।