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Rampur Bushahar News: बगीचों में अर्ली वैरायटी सेब छीन रहा रॉयल की बादशाहत

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रामपुर के जगूणी में तैयार हो रहा हाई डेंसिटी सेब बगीचा। संवाद
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सेब की अर्ली वैरायटी के बगीचे तैयार करने में बागवानों का बढ़ा रुझान
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रॉयल का पेड़ तैयार होने में लगते हैं 15 साल, 3 से 4 साल बाद फसल देने लगता
हाई डेंसिटी में छह माह में हो रहा फल उत्पादन

हाई डेंसिटी के लिए 2.50 और अल्ट्राहाई डेंसिटी के बगीचे लगाने को 3.50 लाख का अनुदान दे रहा बागवानी विभाग

सात हजार फीट की ऊंचाई के लिए अब गाला किस्म के पौधे लगा रहे बागवान


तिलक राज कायथ
रामपुर बुशहर। अपने बेहतरीन स्वाद, मिठास और गुणों के लिए मशहूर सेब की रॉयल डिलीशियस किस्म की बादशाहत अब बगीचों में धीरे-धीरे गुम होती जा रही है और अर्ली वैरायटी का सेब खास होता जा रहा है। आधुनिकता के दौर में सेब की किस्मों में काफी बदलाव आया है। बागवान अब रॉयल सेब की जगह अर्ली वैरायटी के बगीचे तैयार करने में अधिक दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इसकी वजह कहीं न कहीं रॉयल सेब से होने वाले फल उत्पादन में लगने वाला समय है, जिसे देखते हुए बागवान अब स्पर और अर्ली वैरायटी के सेब उत्पादन को अपना रहे हैं। रॉयल सेब के पेड़ से बेहतर फसल लेने के लिए जहां करीब 15 साल का समय लग जाता है। वहीं, अर्ली वैरायटी किस्म के सेब का पौधा 3 से 4 साल में पेड़ बन जाता है और फसल देने लगता है। हाई डेंसिटी में लगाए जा रहे सेब के पौधों से छह माह में ही फल उत्पादन शुरू हो जाता है। इसके चलते अर्ली वैरायटी और हाई डेंसिटी सेब उत्पादन की ओर बागवान अधिक आकर्षित हो रहे हैं। बागवानों का रुझान अब रॉयल सेब की जगह स्पर किस्मों के सेब जैसे गाला और अन्य शुरुआती किस्मों के साथ-साथ हाई डेंसिटी सेब उत्पादन की ओर बढ़ रहा है। इसकी सबसे बढ़ी वजह यह है कि बागवानों को इससे जहां जल्दी फल उत्पादन मिलता है, वहीं उन्हें अच्छा खासा मुनाफा भी हो रहा है। बेहतर क्वालिटी और वैश्विक बाजार की बढ़ती मांग के चलते भी अर्ली वैरायटी के सेब का उत्पादन लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि, पारंपरिक रूप से उगाए जा रहे रॉयल सेब की तुलना में अर्ली वैरायटी के सेब बागवानों की आर्थिकी को अधिक मजबूत कर रहे हैं।

गाला की विभिन्न किस्में और स्पर की किस्मों के पौधों को उगा रहे बागवान
एक समय जहां हिमाचल प्रदेश में केवल रॉयल डिलीशियस की ही खेती होती थी, वहीं अब समय के साथ-साथ रॉयल सेब की बादशाहत समाप्त होती जा रही है। हालांकि, सेब की यह किस्म केवल अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ही कामयाब है, लेकिन इससे बेहतर फसल उत्पादन के लिए करीब 15 साल का समय लग जाता है। बात करें स्पर और अर्ली वैरायटी के सेबों की, तो बागवान इन दिनों डार्क बैरन गाला, किंग रॉट, जैरोमाइन, रेड विलॉक्स और ग्रेनी स्मिथ के पौधे लगाने में अधिक दिलचस्पी दिखा रहे हैं। इन पौधों से 3 से 4 चार में फल उत्पादन शुरू हो जाता है। सेब की यह किस्म कम ऊंचाई वाले इलाकों में अधिक प्रचलित हो रही है। बागवानों को कुछ साल की मेहनत के बाद ही फसल मिलना शुरू हो जाती है।
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हाई डेंसिटी और अल्ट्रा हाई डेंसिटी के लिए लाखों का अनुदान दे रहा विभाग

आधुनिक युग में सेब उत्पादन और वैज्ञानिकी पर आधारित होता जा रहा है। सेब उत्पादन के क्षेत्र विस्तार के लिए योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जा रहा है। हाई डेंंसिटी और अल्ट्रा हाई डेंसिटी क्षेत्र में सेब उत्पादन को बढ़ाया दिया जा रहा है। इसके तहत एम-7 और एम-9 जैसी किस्मों को उगाया जा रहा है। सेब की इन आधुनिक किस्मों से मात्र 6 माह में ही फसल ली जा सकती है। इन किस्मों को उगाने के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन और ड्रिप इरीगेशन की सुविधा होना जरूरी है। बागवानी विभाग हाई डेंसिटी के बगीचे तैयार करने के लिए 2.50 लाख प्रति हेक्टेयर और अल्ट्रा हाई डेंसिटी के लिए 3.50 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर सब्सिडी बागवानी विभाग की ओर से दी जा रही है।
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स्पर और गाला जैसी वैरायटी से कम समय में फल मिलने लगते हैं, जिससे बागवानों को जल्दी आर्थिक लाभ होता है। नई तकनीक जैसे हाई डेंसिटी प्लांटेशन से कम जगह में ज्यादा पेड़ लगते हैं और प्रति हेक्टेयर उत्पादन बढ़ता है। निचले क्षेत्रों में अब बागवानों में हाई डेंसिटी की ओर रुझान बढ़ रहा है। इसके लिए बागवानों का सरकार और बागवानी विभाग की ओर से अनुदान भी दिया जा रहा है।
-संजय कुमार चौहान,
विषयवाद विशेषज्ञ, बागवानी विभाग रामपुर

रामपुर के जगूणी में तैयार हो रहा हाई डेंसिटी सेब बगीचा। संवाद

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