मीरू पंचायत के प्रतिनिधियों ने उपायुक्त को सौंपा ज्ञापन, राहत की लगाई गुहार
संवाद न्यूज एजेंसी
रिकांगपिओ (किन्नौर)। किन्नौर जिले के रूनंग क्षेत्र में वन अधिकारों (एफआरए) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। हाल ही में मीरू पंचायत में आयोजित ग्राम सभा में ग्रामीणों ने उपमंडल स्तरीय समिति भावानगर की ओर से मीरू के दावों को अस्वीकार किए जाने और रूनंग क्षेत्र में बाहरी लोगों के दखल पर कड़ा रोष जताया है। इस संबंध में मीरू पंचायत के प्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने उपायुक्त डॉ. अमित कुमार शर्मा को ज्ञापन सौंपा। दिसंबर में मीरू में हुई विशेष ग्राम सभा में 312 सदस्यों ने भाग लिया। सभा में मुख्य रूप से 8 दिसंबर को उपमंडल स्तरीय समिति की ओर से प्राप्त उस आदेश पर चर्चा हुई, जिसमें एफआरसी मीरू के दावों को खारिज कर दिया गया था। ग्रामीणों का तर्क है कि वन अधिकार समिति मीरू वर्ष 2009 से इस क्षेत्र के पात्र लाभार्थियों के दावों पर सुनवाई कर रही है, ऐसे में अचानक दावों को दरकिनार करना न्यायसंगत नहीं है। ग्राम सभा ने प्रशासन के समक्ष प्रमुख तकनीकी और कानूनी आपत्तियां उठाई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि रूनंग क्षेत्र हमेशा से मीरू पंचायत के कार्यक्षेत्र में रहा है। मीरू के निवासियों का आरोप है कि पुरानी और सक्रिय समिति के होते हुए नई समिति के दावों को प्राथमिकता देना नियमों के विरुद्ध है। दस्तावेजों का हवाला देते हुए ग्रामीणों ने बताया कि रूनंग उप मुहाल बंदोबस्त से पहले मौज मीरू का अभिन्न हिस्सा था, जिसे बाद में रूनंग निचला नाम दिया गया। सभा में आरोप लगाया गया कि युला क्षेत्र के कुछ निवासी, जो पूर्व में नौतौड़ भूमि प्राप्त कर चुके हैं, अब रूनंग में सरकारी और मीरू की शामलात भूमि पर अवैध कब्जा कर रहे हैं। वन अधिकार अधिनियम-2006 की आड़ में इन अवैध कब्जों को नियमित करवाने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीणों ने खेद व्यक्त किया कि इस संवेदनशील मुद्दे पर जिला प्रशासन को पहले भी अवगत कराया गया था, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। ग्राम सभा ने ध्वनि मत से प्रस्ताव पारित कर उपायुक्त से मांग की है कि प्रस्तुत लिखित आपत्तियों और राजस्व दस्तावेजों के आधार पर इस मामले की जल्द सुनवाई की जाए। मीरू के निवासियों के ऐतिहासिक अधिकारों की रक्षा की जाए और बाहरी हस्तक्षेप पर तुरंत रोक लगाई जाए।