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Rampur Bushahar News: उरनी और रिब्बा में धूमधाम से मनाया बिशु पर्व

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पारंपरिक वेशभूषा में सजधज कर ग्रामीणों ने डाली नाटी, वसंत ऋतु का किया स्वागत
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उरनी में हिरणों की वेशभूषा धारण कर लोगों ने किया रावला और रावलाने का नृत्य
संवाद न्यूज एजेंसी

सांगला/रिकांगपिओ(किन्नौर)। जनजातीय जिला किन्नौर अपनी लोक संस्कृति, वेशभूषा और रीति रिवाजों के लिए जाना जाता है। यहां वर्षभर विभिन्न तरह के त्योहार मनाए जाते हैं। इनमें एक पर्व बिशु भी है। जिले के ग्रामीण इस पर्व के जरिये वसंत ऋतु का स्वागत करते हैं। इसी पर्व के बाद किसान जमीनों की खुदाई शुरू करते हैं और विभिन्न तरह के अनाजों को बोया जाता है। जिले के अलग-अलग गांव में इस पर्व को मनाने की अलग-अलग परंपराएं और तिथियां निर्धारित रहती हैं। बर्फबारी के बाद पर्व को मनाने की सदियों से परंपरा चली आ रही है, जिसे आज भी ग्रामीण हर्षोल्लास से मनाते हैं। जनजातीय जिला किन्नौर के रिब्बा गांव में दो दिवसीय बिशु पर्व धूमधाम से मनाया गया। ग्रामीणों ने पर्व के पहले दिन देवता कासुराज के मंदिर में पहुंचकर में पूजा अर्चना की। इसके बाद ग्रामीण तैयार होकर देवता के साथ रिस्पा पंचायत के स्कीबा गांव बोकतीबाल्यो नामक स्थान पर पहुंचे। यहां देवता कासूराज के साथ देवी माता नागिन स्कीबा का मिलन होता है। पूजा-अर्चना के बाद यहां रिब्बा और स्कीबा के ग्रामीण देवधुनों पर दिनभर नाटियों पर झूमते रहे और शाम को अपने-अपने मंदिरों में लौट गए। पर्व के दूसरे दिन सभी ग्रामीण देवता कासूराज के मंदिर में एकत्रित हुए और देरशाम तक पारंपरिक वेशभूषा में सजधज कर देवधुनों पर झूमते गाते रहे। इसी तरह उरनी गांव में भी बिशु मेले को मनाने का अनूठा तरीका है। यहां बद्रीनारायण मंदिर उरनी में ग्रामीण हिरणों की वेशभूषा धारण कर रावला और रावलाने नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। इस परंपरा का प्रचलन आज से छह दशक पहले हुआ करता था, जो ग्रामीणों ने इस बार प्रदर्शित कर किन्नौर में लुप्त होती संस्कृति को बचाने का संदेश दिया। पंचायत प्रधान रिब्बा राधिका नेगी, पूर्व प्रधान प्रेमप्रकाश नेगी, देवता कासूराज के मोतमीन युधिष्ठिर नेगी, पुजारी देवकन नेगी, माथस अंगत नेगी, धर्मेंद्र नेगी, बद्रीनारायण मंदिर के मोतमीन राजेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि क्षेत्र की सुख-समृद्धि और बेहतर फसल होने की उम्मीद से ग्रामीण हर वर्ष इस पर्व को मनाते हैं। पर्व के जरिये सदियों पुरानी परंपरा को आज भी कायम रखा गया है।
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