संवाद न्यूज एजेंसी
रोहडू। प्रदेश के बाहर की नर्सरियों से सेब और अन्य प्रजाति के फलों के अप्रमाणित पौधे बागवानी के क्षेत्र में पहुंचना शुरू हो गए हैं। प्रदेश के पंजीकृत नर्सरी उत्पादक इन पौधों का स्टाॅक मंगवाकर अपने खेतों में जमा कर रहे हैं। दूसरी राज्य की गैर पंजीकृत नर्सरी से पहुंच रहे अप्रमाणित पौधों के साथ खतरनाक वायरस के फैलने का खतरा बढ़ता जा रहा है। जानकारी के अनुसार प्रदेश के पंजीकृत सेब नर्सरी उत्पादक इन पौधों की खेप दूसरे राज्यों से कम दाम पर खरीद कर पहुंचा रहे हैं। अब बारिश आने के बाद सेब के पौधे रोपने का कार्य शुरू हो जाता है। इसके बाद यही पौधे लोगों को पंजीकृत नर्सरी के नाम पर दो से तीन गुणा अधिक दाम पर बेचे जाएंगे। प्रदेश के बागवानी क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे वायरस को रोकने के लिए उद्यान विभाग के शिविरों में लगातार चिंतन हो रहा है। वायरस के संक्रमण से पौधों की उम्र और फल उत्पादन लगातार प्रभावित हो रहा है। वानिकी विश्वविद्यालय अभी तक सेब के कई खतरनाक वायरस खोज चुका है लेकिन इन मुनाफाखोरों को रोकने में सरकारी तंत्र नाकाम नजर आ रहा है। नर्सरी रजिस्ट्रीकरण एवं विनियम अधिनियम 2015 के अनुसार पंजीकृत नर्सरी के भीतर के ही पौधे को बेचने की अनुमति होती है। नर्सरी से खरीदार के सामने ताजा पौधे भूमि से उखाड़कर बेचना होता है। बिक्री के बाद खरीदार को उसका बिल भी देना होता है। खराब एवं बीमारी से ग्रस्त पौधों को नर्सरी के अंदर की नष्ट करना पड़ता है। अगर लापरवाही पाई जाए तो नर्सरी मालिक को एक साल की कैद तक का प्रावधान भी है लेकिन अभी तक नर्सरी अधिनियम को सख्ती से लागू नहीं किया जा रहा है। बागवानी विशेषज्ञ एवं कृषि विज्ञान केंद्र के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक डाॅ. नरेंद्र कायथ का कहना है कि जिस नर्सरी से पौधों का खरीदा जाता है, बागवान उससे बिल जरूर लें। उन्होंने कहा बाहर से पहुंची नर्सरी को खरीदने से बचें। सेब, चेरी, आड़ू और नाशपाति में नए वायरस देखने को मिल रहे हैं। जागरूक बागवान मुनाफाखोरी के चक्कर में सेब आर्थिकी को संकट डालने वालों की उच्च स्तर पर शिकायत करें।