कोटखाई (रोहड़ू)। पहाड़ी क्षेत्रों में सदियों से चली आ रही शांत महायज्ञ की परंपरा के पीछे पौराणिक और धार्मिक आधार बताया जाता है। बुजुर्गों और लोक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में क्षेत्र में आसुरी शक्तियों का प्रभाव अधिक माना जाता था, जो जन-धन, पशुधन और फसलों को भारी नुकसान पहुंचाती थीं। पौराणिक कथाओं के अनुसार उस समय आसुरी शक्तियां इतनी प्रभावशाली थीं कि उनसे बचाव के लिए देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बड़े महायज्ञों का आयोजन किया जाता था, इसलिए इन यज्ञों को शांत महायज्ञ कहा गया, जिनका उद्देश्य क्षेत्र में शांति, सुरक्षा और समृद्धि बनाए रखना है। शांत महायज्ञ के दौरान विभिन्न क्षेत्रों के देवी-देवताओं को विधिवत आमंत्रित किया जाता है। इस यज्ञ की एक विशेष परंपरा है, जिसमें देवताओं के गुरु और ग्रामीण मिलकर ब्रह्म मुहूर्त में मंत्रोच्चारण के साथ पूरे गांव की परिक्रमा करते हैं। इस परिक्रमा को पहाड़ी भाषा में रेख या फेरा कहा जाता है। मान्यता है कि इस रेखा के बनने के बाद आसुरी शक्तियां उसके भीतर प्रवेश नहीं कर पाती थीं और गांव को किसी भी प्रकार की हानि नहीं पहुंचा सकती थीं। शांत महायज्ञ के माध्यम से देवी-देवताओं की शक्तियां प्रबल होकर असुरों पर प्रभावी हो जाती थीं, जिससे क्षेत्र की रक्षा होती थी। बुजुर्गों का कहना है कि पौराणिक पहाड़ी इतिहास में इस परंपरा के जरिए लोगों को आपदाओं, रोगों और असुर शक्तियों से बचाया जाता था।