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Rampur Bushahar News: सेब के बगीचों में बढ़ा माईट का संक्रमण, नियंत्रण नहीं किया तो उत्पादन पर पड़ेगा असर

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सेब के बगीचों में बढ़ा माईट का संक्रमण, नियंत्रण नहीं किया तो उत्पादन पर पड़ेगा असर
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विशेषज्ञों की सलाह, नियमित रूप से पत्तियों की जांच करें
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। क्षेत्र में तापमान बढ़ने के साथ ही सेब के बगीचों में माईट का संक्रमण तेजी से फैलना शुरू हो गया है। बागवानी विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि यदि समय रहते इसकी पहचान और नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह फल और पौधों दोनों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। खासकर, सूखे और गर्म मौसम में माईट तेजी से बढ़ता है और पत्तियों को नुकसान पहुंचाकर पौधों के विकास और फल की गुणवत्ता पर सीधा असर डालता है। विशेषज्ञों के अनुसार, माईट एक बेहद सूक्ष्म कीट होता है, जिसे सामान्य आंखों से पहचानना मुश्किल होता है। यह पत्तियों के निचले हिस्से में रहकर उनका क्लोरोफिल चूसता है। इससे पत्तियों का हरा रंग फीका पड़ने लगता है और वे पीली या कांस्य रंग की दिखाई देने लगती हैं। संक्रमण बढ़ने पर पत्तियां सूखकर समय से पहले गिरने लगती हैं। पत्तियों के खराब होने से पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इससे पौधों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता और फल का आकार छोटा रह सकता है। साथ ही फलों की चमक और गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। लगातार संक्रमण रहने पर अगले वर्ष की फसल क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। छोटे पौधों और नई पौध में इसका खतरा अधिक माना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि लगातार बढ़ता तापमान, कम नमी, लंबे समय तक सूखा मौसम और बगीचों में पर्याप्त सफाई न होना माईट फैलने के मुख्य कारण हैं। धूल भरे वातावरण और अत्यधिक रासायनिक दवाओं के प्रयोग से भी मित्र कीट नष्ट हो जाते हैं, जिससे माईट का प्रकोप तेजी से बढ़ता है। रोकथाम के लिए बागवानों को नियमित रूप से पत्तियों की जांच करने की सलाह दी गई है। पत्तियों के निचले भाग में लाल, भूरे या पीले रंग के छोटे धब्बे दिखाई देने पर तुरंत विशेषज्ञों से सलाह लेकर उचित दवा का छिड़काव करना चाहिए। बगीचों में नमी बनाए रखना, सिंचाई की उचित व्यवस्था करना और खरपतवार नियंत्रण भी जरूरी माना गया है।
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बिना सलाह दवा का न करें उपयोग
उद्यान विकास अधिकारी यशवंत बगींटा ने कहा कि बिना सलाह के बार-बार एक ही दवा का उपयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे माईट में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो सकती है। दवा का छिड़काव सुबह या शाम के समय करना अधिक प्रभावी रहता है। बागवानों को संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाने और समय-समय पर बगीचों की निगरानी करने की सलाह दी गई है, ताकि शुरुआती अवस्था में ही संक्रमण को नियंत्रित किया जा सके।
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