पचास साल बाद थरोच की पांच पंचायतों के आराध्य महेश्वर देवता की पांच दिवसीय जातर का शुभारंभ सोमवार को देवता की विधिवत पूजा और पवित्र स्नान के साथ शुरू हुआ है। जातर 1970 के बाद पचास साल बीतने पर आयोजित की जा रही है। जातर में लोग ढोल-नगाड़ों की थाप पर खूब झूल रहे हैं।देवता की जातर रियासत काल से आयोजित की जाती है। लोगों की मान्यता है कि रियासत का शासक जब बदलता था तब अपने परिवार एवं रियासत की आवाम की सुख समृद्धि के लिए देवता की जातर की परंपरा शुरू हुई थी। सर्वप्रथम देवता का पवित्र स्नान किया गया।
इसके पश्चात देवता की पूजा अर्चना कर जातर मंदिर से शुरू होकर जाबल के मैदान में सम्पन्न हुई। जातर में थरोच की पांच पंचायतों के अलावा न्योल, नेरवा आदि क्षेत्रों से हजारों लोगों ने शिरकत कर रहे हैं। देवलू और देवता के विशेष कहारों द्वारा देवता की पालकी को मशरांह मंदिर से नचाते हुए करीब दो किलोमीटर दूर जाबल मैदान ले जाया गया। देवता की जातर में शामिल देवलू एवं हजारों लोग भी देवधुनों पर खूब झूमे। जाबल पहुंच कर जातर में शामिल श्रद्धालु देवता की पालकी के समक्ष दिनभर देवधुनों पर झूमते रहे।
शाम को देवता की पालकी को वापस मशरांह लाया गया। यहां पालकी को लजाहारी माता के मंदिर के प्रांगण में स्थापित किया गया। मंदिर प्रांगण में रात भर देवता का जागरा चलेगा। जातर का यह सिलसिला पांच दिन तक इसी तरह बदस्तूर जारी रहेगा। सुबह के समय देवता की पालकी को जाबल मैदान ले जाया जाएगा। शाम को वापस जलाहारी माता के मंदिर लाया जाएगा। इस दौरान पांच दिन तक देवता की पूजा अर्चना पालकी में ही होगी। 28 फरवरी को विशेष पूजा के बाद देवता को दोबारा मंदिर में स्थापित किया जाएगा। श्रद्धालुओं के लिए लंगर की व्यवस्था भी की गई है।