रोहड़ू। सेब के बगीचों में पतझड़ के बाद कैंकर रोग का प्रकोप बढ़ने लगा है। इससे बागवानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। चिंता की बात यह है कि कैंकर रोग से सेब के पौधों को काफी नुकसान हो रहा है। प्रूनिंग करते समय बगीचों में बीमारी साफ दिख रही है। सेब के पौधों के साथ-साथ अब यह रोग नाशपाती के पेड़ों में भी तेजी से पनप रहा है।
सेब के पुराने पेड़ों पर कैंकर का असर ज्यादा नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि कैंकर रोग के लक्षण पौधों के तने, शाखाओं और टहनियों पर उभरे या धंसे हुए अनेक रंगों के धब्बों के रूप में नजर आते हैं। रोगी पौधों की छाल कई बार पपड़ी बनकर उखड़ जाती है। ऐसे में पौधे भी सूख जाते हैं। इससे बागवानों की वर्षों की मेहनत पर पानी फिर जाता है।
सूबे में सेब के पौधों में विभिन्न प्रकार के पंद्रह कैंकर रोगों को देखा गया है। ये सभी कैंकर रोग फूंफद जनित हैं। मुख्य रोगों में भूरा तना कैंकर, धुएं वाला झुलसा कैंकर, गुलाबी कैंकर, काला तना, नेल हैंड और रजत पती कैंकर है। इसका समय पर उपचार करना आवश्यक है। बागवानी विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र कायथ ने बताया कि कैंकर रोग पौधों में कई तरह से लगता है।
अगर पौधे की जड़ खराब हो जाए या फिर गलत तरीके से प्रूनिंग करने से भी कैंकर फैलता है। बगीचों में आग जलाने पर भी कैंकर रोग होने की आशंका रहती है। इससे हर वर्ष कई पौधे सूख रहे हैं। अब यह रोग नाशपाती के पेड़ों में भी पनप रहा है।
इससे बागवानों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि फलदार पौधों का उपचार कैंकर रोग की रोकथाम के लिए संतुलित खाद, मिट्टी की जांच के बाद विशेषज्ञ के परामर्श अनुसार तय समय पर डालनी चाहिए। सेब के पौधे की कांट-छांट वैज्ञानिक तरीके से करनी चाहिए।
ज्यादा माटी टहनियों की न काटे। आधा इंच से मोटे कट पर तुरंत चौबटिया पेस्ट लगाएं, कैंकर के घाव पर तेज चाकू से साफ करके उस पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का पेस्ट तैयार करके लगाया जा सकता है। कैंकर की रोकथाम समय पर करने से पौधों को बचाया जा सकता है।