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Rampur Bushahar News: महिलाओं के स्वरोजगार के साथ पर्यावरण संरक्षण का मॉडल बनेगा बोटेनिकल गार्डन

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कुमारसैन के ओड़ी ​स्थित बॉटनिकल गार्डन में स्वयं सहायता समूह की सदस्य और वन विभाग के अ​धिकारी। 
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वन विभाग ने महामाया स्वयं सहायता समूह घुमान को सौंपी जिम्मेवारी, पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा
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संवाद न्यूज एजेंसी
कुमारसैन(रामपुर बुशहर)। ओड़ी का बोटेनिकल गार्डन अब केवल प्राकृतिक सौंदर्य का केंद्र नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए आय, स्वरोजगार और पर्यावरण संरक्षण का एक सशक्त मॉडल बनकर उभरेगा। वन विभाग ने इस बोटेनिकल गार्डन की देखरेख और संचालन की जिम्मेदारी महामाया स्वयं सहायता समूह घुमान (ओड़ी) को सौंपी है। इस पहल से स्थानीय महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा। इस बोटेनिकल गार्डन के माध्यम से स्वयं सहायता समूह की महिलाएं गार्डन के रखरखाव, पौधों की देखभाल, पर्यटकों के मार्गदर्शन और अन्य व्यवस्थाओं से आय अर्जित करेंगी। साथ ही यहां आने वाले पर्यटकों को समूह की ओर से तैयार किए गए स्थानीय उत्पाद और पारंपरिक व्यंजन परोसे जाएंगे। इससे क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिलेगी और स्थानीय खान-पान को भी नया मंच प्राप्त होगा। वन परिक्षेत्र अधिकारी अरुण शर्मा ने बताया कि ओड़ी क्षेत्र में वन विभाग और स्वयं सहायता समूह के संयुक्त प्रयास से बोटेनिकल गार्डन का विस्तार किया जा रहा है। स्वयं सहायता समूह की प्रधान सुषमा वर्मा के साथ कौशल्या रामचैक, वंदना रामचैक, अरुणा रामचैक और मधु श्याम सक्रिय रूप से इस कार्य में सहयोग कर रही हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में पर्यटकों की सुविधा के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे का विकास किया जाएगा, जिससे यहां आने वाले सैलानियों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ें। गार्डन में वन ककड़ी, चोरा, पाषाण वेद, कुंठ, कडू और शिंगि मिगली जैसी महत्वपूर्ण औषधीय वनस्पतियों के विशेष बेड तैयार किए गए हैं। इन पौधों का वैज्ञानिक तरीके से रोपण कर उनके संरक्षण और संवर्धन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इस अवसर पर अमर नयन राष्ट्रोदय संगठन के सह प्रमुख चयन एवं हिमाचल प्रदेश के प्रांत प्रभारी भी मौजूद रहे। उन्होंने कहा कि वनौषधियां मानव जीवन के लिए रामबाण हैं। प्राचीन काल में इन्हीं जड़ी-बूटियों से असाध्य रोगों का उपचार किया जाता था और यही हमारी पुरातन सनातन परंपरा है, जो आज भी जीवित है।
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