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Rampur Bushahar News: मौसम की लगातार मार से सेब उत्पादन पर संकट

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चिलिंग ऑवर्स की कमी, ओलावृष्टि और अंधड़ ने तोड़ रहा बागवानों की कमर
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अच्छी फसल के लिए 1200 से 1600 घंटे तक 7 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान जरूरी
संवाद न्यूज एजेंसी
रोहड़ू। हर साल मौसम की मार ने सेब उत्पादन को संकट में डाल दिया है। पिछले साल की तुलना में इस बार पैदावार में भारी गिरावट की आशंका है। उद्यान विभाग ने अभी तक आधिकारिक आकलन जारी नहीं किया है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात चिंताजनक हैं। क्षेत्र के बागवान मायूस हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बार सर्दियों में आवश्यक चिलिंग ऑवर्स पूरे नहीं हो पाए, जो सेब उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। सेब की अच्छी फसल के लिए 1200 से 1600 घंटे तक 7 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान जरूरी माना जाता है। चिलिंग ऑवर्स की कमी के कारण खासकर रॉयल सेब के पेड़ों में फूल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हुई है, जिससे फल बनने की क्षमता कमजोर पड़ गई है। साथ ही पिछले साल समय से पहले हुए पतझड़ ने सेब के पेड़ों की पोषक तत्व संचय क्षमता को भी प्रभावित किया है, जिससे पौधों की वृद्धि और रोग प्रतिरोधक क्षमता घट गई है। बागवानी विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र कायथ ने बताया कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से बागवानी पर दिखने लगा है। तापमान में असामान्य उतार-चढ़ाव, अनियमित बारिश और सूखे जैसे हालात से सेब के पेड़ों की जैविक प्रक्रियाएं प्रभावित होती हैं। इस कारण फूल विकसित नहीं होते, फल का आकार छोटा रह जाता है। इससे उत्पादन में कमी आना स्वाभाविक है। उन्होंने बागवानों को आधुनिक तकनीकों को अपनाने और जलवायु के अनुरूप किस्मों के चयन की सलाह दी।
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कम पैदावार होने की क्षेत्र से बागवान रिपोर्ट
उद्यान विकास अधिकारी यशवंत बगींटा ने बताया कि इस बार मौसम की मार कई स्तरों पर पड़ी है। अभी तक बहुत कम पैदावार होने की क्षेत्र से बागवान रिपोर्ट दे रहे हैं। उद्यान विभाग की ओर से अभी पैदावार का आकलन नहीं किया गया। ओलावृष्टि, तेज बारिश और अंधड़ ने बागवानों का नुकसान किया है। खासकर, मध्यम और निचले इलाकों में फसल बहुत कम है। यदि भविष्य में भी मौसम का यह असंतुलन जारी रहा, तो पारंपरिक सेब उत्पादक क्षेत्र गंभीर रूप से प्रभावित होंगे। ऐसे हालात में बागवानों के लिए जरूरी है कि वे वैज्ञानिक प्रबंधन, सूक्ष्म सिंचाई, एंटी हेलनेट जैसे सुरक्षात्मक उपायों और जलवायु अनुकूल किस्मों को अपनाकर जोखिम को कम करने की दिशा में कदम उठाएं।
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