मर्ज किए जा रहे देवठी स्कूल से आठ किलोमीटर दूर पहुंचना छात्रों को होगा मुश्किल
सरकार और शिक्षा विभाग से नाराज अभिभावकों ने दी कोर्ट जाने की चेतावनी
दुर्गम क्षेत्र के विद्यार्थियों की मुश्किलें बढ़ा रहा सरकार का फरमान
संवाद न्यूज एजेंसी
डंसा(रामपुर बुशहर)। उपमंडल के दुर्गम क्षेत्र 12/20 क्षेत्र की उच्च पाठशाला कूहल का दर्जा घटाकर माध्यमिक करने पर अभिभावक भड़क गए हैं। उच्च पाठशाला के विद्यार्थियों को अब करीब आठ किलोमीटर दूर देवठी जाने को मजबूर होना पड़ेगा।
दुर्गम क्षेत्र और बस सुविधा के अभाव में विद्यार्थियों को खासी परेशानियां झेलनी पड़ेंगी। सरकार और शिक्षा विभाग से नाराज अभिभावकों ने इस निर्णय को वापस लेने की मांग उठाई है। उन्होंने चेताया है कि यदि फैसला वापस नहीं लिया गया तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होंगे। अभिभावकों का कहना है कि छात्रों की कम संख्या वाले उच्च और वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालयों का दर्जा घटाने से दूरदराज और पिछड़ी पंचायतों के विद्यार्थियों की दुश्वारियां बढ़ रही हैं। इन स्कूलों में अध्ययनरत छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है। 12/20 क्षेत्र की कूहल पंचायत स्थित उच्च पाठशाला का उप निदेशालय प्रारंभिक ने आदेश जारी कर दर्जा घटाया है और वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला देवठी में मर्ज किया जाना प्रस्तावित है। शिक्षा विभाग के तय मानकों के अनुरूप चार किलोमीटर के दायरे के भीतर स्थापित कम संख्या वाले स्कूलों को अन्यत्र मर्ज किए जाने का प्रावधान किया गया है, लेकिन उक्त पाठशाला की देवठी से सड़क से दूरी करीब आठ किलोमीटर पड़ती है, जबकि पैदल 6 किलोमीटर है। अभिभावकों की मानें तो स्टाफ के अभाव में विद्यार्थी दूसरे स्कूलों की ओर पलायन करने को मजबूर हुए थे। इस साल छात्रों की संख्या 9 तक पहुंच गई है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन रहे अभिभावकों के बच्चों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। बताते चलें पहले पत्राचार के माध्यम से पाठशाला प्रबंधन की ओर से दूरी गलत दर्शाई गई थी, जिसे अब फिर से 20 सितंबर को जारी पत्राचार के माध्यम से प्रारंभिक शिक्षा विभाग को दूरी दुरुस्त करवा कर प्रेषित की गई है।
अभिभावक जोबन दास, सतीश कुमार, लोभा राम, अनवीर, दलीप कुमार, संतोष कुमार और बुध राम ने बताया कि प्रदेश सरकार और प्रारंभिक शिक्षा विभाग से विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए पुनर्विचार करने की मांग की है। उन्होंने चेताया कि यदि सरकार यह फैसला वापस नहीं लेती तो ग्रामीण कोर्ट का दरवाजा खटखटाने को बाध्य होंगे।