किन्नौर के दुर्गम चांगों गांव की अंगमो नेगी ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति और साहस से एक बार फिर असंभव को संभव कर दिखाया है। आंखों की रोशनी न होने के बावजूद उन्होंने स्पीति घाटी में आयोजित 77 किलोमीटर लंबी हाई एल्टीट्यूड मैराथन सफलतापूर्वक पूरी की।
माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई कर भारत की पहली दृष्टिबाधित महिला पर्वतारोही बनने के बाद अंगमो नेगी ने अब देश की सबसे चुनौतीपूर्ण ऊंचाई वाली मैराथन में अपनी क्षमता साबित की है। उनकी इस उपलब्धि को भारतीय सेना ने भी विशेष रूप से सम्मानित किया।
कुंजुम टॉप से काजा तक 77 किलोमीटर की दौड़
भारतीय सेना ने ऑपरेशन सद्भावना के तहत 28 अगस्त को कुंजुम टॉप से काजा तक सूर्य स्पीति चैलेंज मैराथन का आयोजन किया था। समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर हुई इस दौड़ में प्रतिभागियों को बेहद कठिन भौगोलिक और मौसम संबंधी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।
दौड़ के रास्ते में पथरीले और दुर्गम ट्रैक, खड़ी चढ़ाई और बर्फीले तूफान जैसी चुनौतियां सामने आईं। ऐसी परिस्थितियों के बीच दृष्टिबाधित अंगमो नेगी का 77 किलोमीटर का सफर पूरा करना उनकी असाधारण शारीरिक क्षमता और मानसिक मजबूती को दर्शाता है।
एवरेस्ट के बाद फिर साबित किया जज्बा
अंगमो नेगी इससे पहले भी पर्वतारोहण की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं। 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की थी। इस उपलब्धि के साथ वह भारत की पहली दृष्टिबाधित महिला पर्वतारोही बनी थीं। अब हाई एल्टीट्यूड मैराथन पूरी करके उन्होंने एक बार फिर साबित किया है कि शारीरिक चुनौतियां मजबूत इच्छाशक्ति के सामने बाधा नहीं बन सकतीं।