महिला आरक्षण से बदले चुनावी समीकरण, स्थानीय मुद्दों और असंतोष पर टिकी नजर
पार्किंग, जाम और अधूरे प्रोजेक्ट बने बड़े मुद्दे
बुनियादी सुविधाओं पर सवाल
सोशल मीडिया पर प्रचार तेज, वोटर चुप
इस बार महिला उम्मीदवार संभालेगी नगर परिषद ठियोग के अध्यक्ष की कुर्सी
चार वार्ड महिलाओं, एक पुरुष अनुसूचित जाति, दो वार्ड अनारक्षित
जातीय समीकरण और टिकट वितरण पर रहेगी मतदाताओं की नजर
सुनील ग्रोवर
ठियोग (रामपुर बुशहर)। नगर परिषद ठियोग के चुनाव की घोषणा के साथ सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। सात वार्डों वाली नगर परिषद में इस बार मुकाबला केवल उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि विकास बनाम वादों और उम्मीद बनाम अनुभव के बीच भी होगा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही दल जमीनी फीडबैक जुटाकर प्रत्याशियों की तलाश में हैं, जबकि कई निर्दलीय चेहरे भी सक्रिय हो गए हैं।
अध्यक्ष पद का महिला आरक्षित होना इस बार चुनावी समीकरणों को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है। सात में से चार वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। एक वार्ड पुरुष अनुसूचित जाति के लिए और दो वार्ड अनारक्षित हैं। इससे सामाजिक और जातीय समीकरण टिकट वितरण में अहम भूमिका निभाएंगे।
स्थानीय मुद्दों की बात करें तो कस्बे में केवल 25 वाहनों की पार्किंग है। जो बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त नहीं है। बाजार क्षेत्र में रोजाना जाम की स्थिति बनी रहती है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए बन रहा पार्क ढाई साल से अधूरा है। युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं। शॉपिंग कॉम्प्लेक्स जैसे प्रस्ताव अब तक कागजों में ही सिमटे हुए हैं। खेल गतिविधियों और सामुदायिक कार्यक्रमों के लिए भी पर्याप्त स्थान का अभाव है। नगर परिषद के पास खुद का व्यवस्थित भवन न होना भी एक प्रमुख समस्या बनकर उभर रहा है।
सोशल मीडिया बना मैदान, वोटर खामोश
चुनाव से पहले संभावित उम्मीदवार सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक और व्हाट्सएप पर सक्रिय हो गए हैं। वे पोस्ट के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि 1836 मतदाताओं में से अधिकांश अभी भी खामोश हैं, जिससे चुनाव और दिलचस्प हो गया है।
विकास बनाम असंतोष
पिछले कार्यकाल में कुछ सकारात्मक काम भी हुए हैं। कई वार्डों में रास्तों का निर्माण, सफाई व्यवस्था में सुधार और 14 साल से लंबित सीवरेज योजना की शुरुआत। इसके अलावा कस्बे में सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं। बावजूद इसके, एक बड़ा वर्ग मानता है कि बड़े विजन वाले प्रोजेक्ट्स की कमी रही है, जिससे असंतोष की भावना बनी हुई है।
राजनीतिक रणनीति और समीकरण
कांग्रेस अपने पारंपरिक वोट बैंक को साधने में जुटी है, जबकि भाजपा केंद्र और प्रदेश सरकार की योजनाओं के सहारे चुनावी रणनीति बना रही है। निर्दलीय उम्मीदवार स्थानीय मुद्दों को उठाकर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकते हैं। महिला आरक्षण के चलते इस बार पर्दे के पीछे की राजनीति भी देखने को मिल सकती है। कई पुरुष नेता महिला रिश्तेदारों को चुनाव मैदान में उतार सकते हैं। वहीं व्यापारी वर्ग बसों के पुराने रूट पर न चलने से व्यापार प्रभावित होने की बात कर रहा है। यह असंतोष आने वाले चुनावों में क्या असर डालेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।