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हर साल करोडों की संपति चढ़ रही आग की भेंट सुरक्षित नहीं लकड़ी से बने मकान

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- फोटो : self
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अमर उजाला ब्यूरो।
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रोहड़ू। पहाड़ी क्षेत्रों में लकड़ी से बने मकान हर साल आग की भेंट चढ़ जाते हैं। गांव में काष्ठकुणी शैली में बने मकानों का अस्तित्व पर खतरे में है। एक घर में चिंगारी सुलगने के बाद पूरा गांव आग से दहक उठता है। बीते कुछ सालों में करोड़ों की धरोहरें राख में तबदील हो चुकी हैं। पहाड़ी इलाकों की हालत यह है कि आग की घटना के बाद दकमल दस्तों को पहुंचने के लिए कहीं सड़के नहीं तो कहीं खराब सड़कों पर वाहनों को पहुंचने में तीन गुणा अधिक समय लग जाता है। दो दिन पहले कशैणी गांव में हुई घटना ने पुरानी यादों को ताजा कर दिया है। कशैणी गांव में 54 परिवार आग की घटना के बाद बेघर हो गए हैं। पिछले साल 15 जनवरी की रात चिड़गांव तहसील का तांगणू गांव आग से राख हो गया था। इस अग्निकांड से आग से करीब सत्तर परिवार बेघर हो गए थे। करोड़ों की संपत्ति, दर्जनों मवेशी आग की भेंट चढ़ गए थे। तीन साल पहले 2015 की सर्दियों में डोडरा क्वार क्षेत्र के धारा गांव में अग्निकांड से करीब एक दर्जन परिवार बेघर हो गए थे। सीमा गांव में आग से दो घरों में करोड़ों रुपयों का नुकसान हुआ। हर साल क्षेत्र में दर्जनभर से अधिक आग की घटनाएं होती हैं। बीते एक दशक के दौरान कोटखाई के महासू में एतिहासिक किला, पनोग पंचायत में तीन आलीशान घर, टाऊ का आधा गांव, चैथला गांव के पुराने एतिहासिक घर, कलबोग, थरोला गांव सहित रोहड़ू के गंगा नगर में भी आग से भारी नुकसान हो चुका है। इससे पहले खड़ापत्थर में भी आग से कई घर राख हो चुके हैं। पांच साल पहले ही रोहडू उपमंडल की रोहल पंचायत का पूरा चिचवाड़ी गांव आग की भेंट चढ़ गया था। यानी हर साल एक गांव स्वाहा होता जा रहा है। सरकार की ओर से पुरानी धरोहरों को बचाने का प्रयास नहीं किया गया तो क्रम वार जल रहे ऐतिहासिक गांव खत्म हो जाएंगे।
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