रोहड़ू। विदेशों की तर्ज पर अब बागवान सेब के बगीचों में ड्रोन से जरूरी दवाइयों और पोषक तत्वों का स्प्रे करेंगे। आने वाले समय में इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ समय और दवाइयों की बचत होगी। बगीचों में बागवानों की प्रति किलो सेब उत्पादन लागत में भी कमी आएगी।
उद्यान विभाग ने विश्व बैंक पोषित परियोजना के तहत ड्रोन से सेब के बगीचों में स्प्रे ट्रायल बागवानी के क्षेत्र में शुरू कर दिया है। हालांकि इस संबंध में उद्यान विभाग के अधिकारियों के अनुसार भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर ड्रोन में अभी कई सुधार की जरूरत है। इसके लिए बागवानों के सुझाव भी लिए जा रहे हैं। एक साल तक पूरे प्रदेश में ड्रोन से स्प्रे का ट्रायल चलता रहेगा।
हिमाचल में करीब चार हजार करोड़ की आर्थिकी बागवानी पर निर्भर है। प्रदेश में सेब उत्पादन लागत विदेशों की तुलना तीन से चार गुणा अधिक है। प्रति हेक्टेयर औसतन सेब उत्पादन भी दूसरे देशों से हिमाचल में बहुत अधिक है। अब विदेशों की तर्ज पर प्रदेश उद्यान विभाग हर साल बागवानी में नए प्रयोग कर रहा है। हिमाचल में हर साल सेब के बगीचों में कीटनाशकों और अन्य दवाइयों का सबसे अधिक प्रयोग होता है। जिससे पर्यावरण के साथ बागवानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
अब उद्यान विभाग ने विश्व पोषित परियोजना के तहत एक कंसलटेंट कंपनी को सेब के बगीचों में स्प्रे के लिए विदेशी तकनीक अपनाने के प्रयोग शुरू कर दिया है। इससे पहले रूट स्टॉक पर सरकार काम कर चुकी है। उद्यान विभाग की ओर से रोहड़ू के कृषि विज्ञान केंद्र में 12 अप्रैल को ड्रोन से स्प्रे का ट्रायल किया गया। वहीं 14 अप्रैल को एक ट्रायल कोटखाई में किया गया। इस दौरान जो खामियां सामने आईं अब ड्रोन में सुधार करवाना होगा। परीक्षण सफल रहा तो बागवानों को स्प्रे का झंझट कम होने वाला है।
उद्यान विकास अधिकारी डॉ कुशल मेहता के अनुसार ट्रायल के दौरान यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर ड्रोन में अभी कई सुधार की जरूरत है। इसके लिए बागवानों के सुझाव भी लिए जा रहे हैं। एक साल तक पूरे प्रदेश में ड्रोन से स्प्रे का ट्रायल चलता रहेगा। इससे दूसरी फसलों में भी स्प्रे की जा सकती है। विदेशों में इस तकनीक का स्वयं देख चुके हैं। इससे बगीचें में स्प्रे का होने वाला खर्च आधे से कम हो जाएगा।