नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में बेशक खनन को लेकर केस विचाराधीन हो, लेकिन केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की नई अधिसूचना से हिमाचल में लगी रोक बहुत हद तक हट गई है। इसके अनुसार हिमाचल सरकार अब 25 हेक्टेयर तक के खनन क्षेत्र के मामलों में अपने स्तर पर फैसला ले सकेगी।
पांच हेक्टेयर तक के मामलों में अब वन मंजूरी लेने की अनिवार्यता हटा दी गई है।
हिमाचल के पांच से 25 हेक्टेयर के बीच खनन के 119 केस भारत सरकार में पिछले एक साल से लंबित थे। ये अब क्लीयर हो जाएंगे।
केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के निदेशक डॉ. पीबी रस्तोगी की ओर से जारी अधिसूचना में पर्यावरण प्रभाव आकलन की बी कैटेगरी को बी-1 और बी-2 के बीच बांटकर यह राहत दी गई है।
इससे खनन के केस क्लीयर होंगे और राज्य में रेत-बजरी की किल्लत दूर होगी। इससे रेत बजरी के रेट गिरेंगे और लोगों को राहत मिलेगी।
इसके बाद अब राज्य में नई खनन नीति शुक्रवार से लागू हो गई है। हालांकि, खनन विभाग ने साथ ही वन और राजस्व विभाग से कहा है कि वह अपनी जमीन पर हो रहे अवैध खनन की निगरानी स्वयं करें।
तीन नए फैसले
1. राज्य से बाहर रेत ले जाने पर रोक कीमतें नियंत्रित होने तक जारी रहेगी। फिनिश्ड गुड्स कैटेगरी की क्रशर की रेत बजरी ही बाहर जाएगी।
2. माइनिंग अफसर अब गृह जिले में तैनात नहीं होंगे। जो वर्तमान में अपने जिले में हैं, उन्हें जल्द बदलने के आदेश उद्योग विभाग को दिए गए हैं।
3. रेत के लिए परमिट जारी होंगे। खनन एम फार्म से होगा और क्रशर की सप्लाई के लिए सप्लीमेंट्री फार्म होगा। इस तरह खनन नीति लागू हुई है।
कोट्स
वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मिली राहत से अब राज्य में खनन नीति लागू हो गई है। राज्य में इससे पहले 1986, 1998, 2004 और अब 2013 में खनन पालिसी बनी। चारों बार कांग्रेस की सरकार ही नीति लाई, जिससे लोगों को राहत मिले।
- मुकेश अग्निहोत्री, उद्योग मंत्री हिमाचल सरकार।