सराज की पहाड़ियों में पीढ़ियों से सहेजी जा रही रणसिंघा बनाने की कला अब राष्ट्रपति तक पहुंचने जा रही है। थाची के हस्तशिल्पकार वीर सिंह ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के लिए पीतल और तांबे से विशेष स्मृति चिन्ह तैयार किया है। 6 अक्तूबर को एम्स बिलासपुर के पहले दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति को यह स्मृति चिन्ह भेंट किया जाएगा। वीर सिंह इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भी अपने हाथों से तैयार रणसिंघे भेंट कर चुके हैं।
पहाड़ों में कुछ हुनर ऐसे होते हैं, जिन्हें किताबों में नहीं पढ़ाया जाता। वे हाथों से सीखे जाते हैं, पीढ़ियों से आगे बढ़ते हैं और वक्त के साथ उनकी कीमत और बढ़ती जाती है। सराज के थाची गांव के वीर सिंह का रणसिंघा बनाने का हुनर भी ऐसी ही कहानी कहता है।
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कभी गांव की देव परंपराओं और धार्मिक आयोजनों में अपनी गूंज से माहौल को खास बनाने वाला रणसिंघा अब एक और खास सफर पर निकल पड़ा है। इस बार सराज के इस पारंपरिक हुनर की गूंज देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचने वाली है।
थाची निवासी हस्तशिल्पकार वीर सिंह के हाथों से तैयार किया गया विशेष रणसिंघा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को स्मृति चिन्ह के रूप में भेंट किया जाएगा। राष्ट्रपति 6 अक्तूबर को बिलासपुर स्थित एम्स के पहले दीक्षांत समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होंगी। इसी दौरान उन्हें यह खास स्मृति चिन्ह भेंट करने की तैयारी है।
दो रणसिंघों के बीच दिखेगा एम्स का लोगो
यह स्मृति चिन्ह भी सामान्य नहीं है। वीर सिंह ने इसे खास तौर पर तैयार किया है। पीतल और तांबे से बनाए गए दो रणसिंघों के बीच एम्स का लोगो बनाया गया है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक मशीनों के दौर में भी इस पूरे काम की आत्मा वही पुरानी है—कारीगर के हाथ, अनुभव और पीढ़ियों से चली आ रही कला।
वीर सिंह बताते हैं कि रणसिंघे और देवताओं के मोहरे आज भी हाथ से तैयार किए जाते हैं। इस काम में उनका पूरा परिवार साथ देता है। यानी एक रणसिंघा तैयार होता है तो उसके साथ सिर्फ धातु नहीं ढलती, बल्कि परिवार की कई पीढ़ियों की मेहनत और परंपरा भी उसमें आकार लेती है।
सराज से निकला हुनर पहले भी पहुंच चुका है पीएम मोदी तक
वीर सिंह के लिए राष्ट्रपति को रणसिंघा भेंट करना पहला बड़ा पड़ाव नहीं है। इससे पहले उनके हाथों से तैयार रणसिंघे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद तक पहुंच चुके हैं। देश के अलग-अलग हिस्सों के अलावा विदेशों में भी उनके बनाए रणसिंघे स्मृति चिन्ह के रूप में पहुंच चुके हैं। यानी सराज के एक छोटे से क्षेत्र में पीढ़ियों से संजोया गया यह हुनर अब हिमाचल की सीमाओं से बाहर अपनी पहचान बना रहा है।
यह सिर्फ रणसिंघा नहीं, सराज की पहचान है
रणसिंघे को अगर केवल एक सजावटी वस्तु समझा जाए तो शायद इसकी असली कहानी छूट जाएगी। हिमाचल की देव संस्कृति में इसका अपना खास स्थान है। प्रदेश के कई क्षेत्रों में देव परंपरा और धार्मिक आयोजनों के दौरान रणसिंघे की मौजूदगी आज भी देखने को मिलती है। वीर सिंह के लिए इसलिए यह काम केवल कमाई का जरिया नहीं है। यह उनके परिवार की सांस्कृतिक विरासत है, जिसे वे अपने हाथों से अगली पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं।
जीआई टैग ने बदली पहचान, सम्मान भी मिला
रणसिंघे को जीआई टैग मिलने के बाद इस पारंपरिक कला को नई पहचान मिली है। वीर सिंह को हस्तशिल्प को बचाने और आगे बढ़ाने के प्रयासों के लिए पिछले वर्ष दिल्ली में यंग आर्टिजन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। अब राष्ट्रपति को उनके हाथों का तैयार स्मृति चिन्ह भेंट किया जाना इस सफर की एक और बड़ी उपलब्धि है।
वीर सिंह का मानना है कि जीआई टैग मिलने के बाद रणसिंघा बनाने की इस कला को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल सकती है। हालांकि उनका एक सवाल भी है—जिस कला को कारीगर अपनी पीढ़ियों की मेहनत से जिंदा रखे हुए हैं, उसका असली लाभ भी उन्हीं कारीगरों तक पहुंचना चाहिए। इसीलिए उन्होंने जीआई टैग व्यवस्था में बिचौलियों की भूमिका कम करने और वास्तविक हस्तशिल्पकारों को अधिकृत उपयोगकर्ता बनाने की मांग उठाई है।
राष्ट्रपति तक पहुंचेगा तो सिर्फ एक स्मृति चिन्ह नहीं होगा
6 अक्तूबर को जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को यह रणसिंघा भेंट किया जाएगा, तब वह सिर्फ एक स्मृति चिन्ह नहीं होगा। उसमें सराज के थाची गांव की मिट्टी, वीर सिंह के परिवार की पीढ़ियों की मेहनत और हिमाचल की देव संस्कृति की झलक भी होगी। एक छोटे से पहाड़ी गांव में हाथों से तैयार हुआ रणसिंघा जब राष्ट्रपति तक पहुंचेगा, तो यह उस हुनर की भी जीत होगी जो मशीनों के दौर में भी अपने हाथों की पहचान बचाए हुए है।