मंडी। शहर में होली पारंपरिक ज्योतिषीय गणना और सदियों पुरानी परंपरा के मुताबिक देशभर से एक दिन पहले होलिका दहन के दिन मनाई जाती है। होली फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को ही मनाई जाती है। यह अमूमन होलिका दहन का ही दिन होता है। मंडी के राजा (भगवान कृष्ण) माधो राय की पालकी पूरे नगर का भ्रमण करती है जिसे जलेब कहा जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
मंडी होली की खासियत यह है कि यहां गैरों पर रंग नहीं डाला जाता। बिना जान-पहचान के किसी पर रंग नहीं डालते और महिलाएं भी बाजार में होली खेलने आती हैं। फाल्गुन की पूर्णिमा का मौसम आते ही मंडी शहर गुलाल और रंगों से सराबोर हो जाती है। यहां की होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि भक्ति और इतिहास का भी संगम है। होली की परंपरा 18वीं सदी से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि उस समय राजा सूरज सेन के 18 पुत्रों की असामयिक मौत हो गई थी। इस गहरे दुःख में राजा ने अपना पूरा राज्य भगवान माधव राय को समर्पित कर दिया। तब से मंडी के लोग राज देवता माधो राय (भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण) को रियासत की बागडोर संभाल दी थी। राज देवता माधो राय की चांदी व सोने से जड़ी पालकी मंदिर से निकलती है तो उसमें विराजमान माधो राय की मूर्ति को हजारों लोग घेरते हैं।
हर स्थान का अक्षांश अलग है। मंडी में पंचाग के आधार पर ही होली का आयोजन किया जाता है। पुण्य का भी ध्यान रखा जाता है। पंचाग में भी अंकित है कि पहले होली खेली जाती है और बाद में होलिका दहन होता है। अगर दहन पहले हो जाए तो होली खेलना तर्कसंगत भी नहीं है। रियासतकाल से होली की परंपरा का निर्वहन किया जा रहा है।
-पंडित दीपक शर्मा, ज्योतिषाचार्य