बंपर पैदावार के बावजूद आधे से भी कम दाम मिलने से मायूस ग्रामीण
सरकार से सीधी खरीद और न्यूनतम मूल्य तय करने की मांग
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संवाद न्यूज एजेंसी
बालीचौकी (मंडी)। पहाड़ों के लोगों के लिए गुच्छी सिर्फ एक मशरूम नहीं, बल्कि सालभर की अतिरिक्त आमदनी का बड़ा सहारा है। हर साल ग्रामीण जान जोखिम में डालकर जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों में इसकी तलाश में निकलते हैं। इस बार प्रकृति मेहरबान रही और गुच्छी की बंपर पैदावार हुई, लेकिन जब इसे बेचने की बारी आई तो अपेक्षित दाम नहीं मिल सके।
बालीचौकी के राम सिंह, श्याम सिंह, लता देवी और कांता देवी ने बताया कि वे सुबह अंधेरा रहते ही गुच्छी की तलाश में जंगलों की ओर निकल पड़ते हैं। कई घंटों की कड़ी मेहनत के बाद थोड़ी-बहुत गुच्छी हाथ लगती है। इस बार उन्हें उम्मीद थी कि अच्छी पैदावार से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, लेकिन बाजार में मिले दामों ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। आमतौर पर 10 से 15 हजार रुपये प्रति किलो तक बिकने वाली गुच्छी इस बार कई जगह 5 से 6 हजार रुपये प्रति किलो तक ही बिक रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि उनके पास बड़े बाजारों तक पहुंचने के साधन नहीं हैं, इसलिए वे स्थानीय व्यापारियों और बिचौलियों पर निर्भर रहते हैं। उनका आरोप है कि यही बिचौलिए कम दाम पर गुच्छी खरीदकर बड़े शहरों और बाहरी बाजारों में कई गुना अधिक कीमत पर बेचते हैं। ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि गुच्छी की खरीद के लिए विशेष केंद्र स्थापित किए जाएं और इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) जैसी व्यवस्था लागू की जाए।
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हिमालय का सोना कहलाती है गुच्छी
हिमालय के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली गुच्छी अपनी दुर्लभता और ऊंची कीमत के कारण हिमालय का सोना कहलाती है। स्थानीय भाषा में इसे टटमोर और डुघरू के नाम से भी जाना जाता है। अपने स्वाद और औषधीय गुणों के कारण इसकी देश-विदेश में भारी मांग रहती है। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुच्छी के प्रशंसक हैं।