मंडी। अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्रि महोत्सव केवल एक मेला नहीं, बल्कि सदियों पुरानी देव-मर्यादाओं का जीवंत प्रमाण है। रियासतकाल भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन मंडी के देवी-देवता आज भी उन प्राचीन परंपराओं का निर्वहन पूरी निष्ठा के साथ कर रहे हैं। इस महोत्सव में कई ऐसे रहस्य और परंपराएं हैं, जो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। इनमें सबसे सबसे खास हैं नरोल देवियां, जो घंघूट में विराजती हैं।
महोत्सव में शिरकत करने वाली छह विशिष्ट देवियां ऐसी हैं, जो पूरे मेले के दौरान राजमहल (राजबेहड़े) की मर्यादा में ही विराजती हैं। इन्हें नरोल देवियां कहा जाता है। इनमें माता बगलामुखी, बूढ़ी भैरवा, काश्मीरी माता, धूमावती, बुशाई माता और रूपेश्वरी शामिल हैं। ये देवियां न तो जलेब (शाही शोभायात्रा) में शामिल होती हैं और न ही पड्डल मैदान के देव-समागम का हिस्सा बनती हैं। उधर, सर्व देवता सेवा समिति के अध्यक्ष शिवपाल शर्मा का कहना है कि देवी देवताओं का इतिहास समृद्ध है। सदियों से चली परंपरा आज भी निभाई जा रही है। संवाद
अटूट देव-मिलन- छमांहू शेषनाग और देव छांजणू का साथ
महोत्सव में पहुंचे बालीचौकी क्षेत्र के देवता छमांहू शेषनाग और माता हिडिंबा के पुत्र घटोत्कच (देव छांजणू) के बीच आज भी अटूट रिश्ता कायम है। ये दोनों देवता कभी अकेले नहीं निकलते। मान्यता है कि चाहे मनाली में माता हिडिंबा से मिलने जाना हो या शिवरात्रि महोत्सव में शिरकत करनी हो, इन दोनों के रथ हमेशा साथ चलते हैं। सर्व देवता सेवा समिति के अध्यक्ष शिवपाल शर्मा कहते हैं कि देवी-देवताओं का यह समृद्ध इतिहास हमारी संस्कृति की असली पहचान है।
चावल के दानों से देववाणी और संकट निवारण
मेले में देवता के गूर श्रद्धालुओं को चावल के दाने (पाने) देकर उनकी समस्याओं का समाधान कर रहे हैं। यदि श्रद्धालु के हाथ में 3, 5, 7 या 9 दाने आते हैं, तो इसे शुभ और देव-कृपा का संकेत माना जाता है। वहीं, 4, 6, 8 या 10 दाने आने पर संभावित अनहोनी के प्रति सचेत कर रक्षा के उपाय सुझाए जाते हैं। वल्लभ महाविद्यालय में सराज के थाची क्षेत्र के देव घटोत्कच आशु के गूर पांशा और चावल के दानों से लोगों की जिज्ञासा शांत कर रहे हैं।
राज बेहड़े में विराजमान नरोल की देवियां। संवाद
राज बेहड़े में विराजमान नरोल की देवियां। संवाद