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हिमाचल प्रदेश: मशीन लर्निंग से होगी भूस्खलन की सटीक भविष्यवाणी, आईआईटी मंडी ने तैयार किया नया सिस्टम

Sun, 13 Sep 2026 11:54 AM IST
Ankesh Dogra राकेश राणा, मंडी।

सार

हिमालय में भूस्खलन के बढ़ते खतरे के बीच आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने नया मशीन लर्निंग सिस्टम तैयार किया है। रैंडम फॉरेस्ट तकनीक से भौगोलिक स्थिति और बारिश के प्रभाव का विश्लेषण कर संवेदनशील क्षेत्रों में संभावित भूस्खलन की जानकारी देने की कोशिश की गई है।
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आईआईटी मंडी - फोटो : संवाद
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विस्तार
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हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे भूस्खलन के खतरे से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग आधारित नया लैंडस्लाइड नाउकास्टिंग सिस्टम विकसित किया है। यह प्रणाली किसी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और बारिश के प्रभाव का एक साथ विश्लेषण कर भूस्खलन की आशंका का आकलन करेगी।

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विशेषज्ञों का दावा है कि इस तकनीक से प्रभावित क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी जारी करने और नुकसान कम करने में मदद मिल सकती है। अध्ययन मशीन लर्निंग–ड्रिवन लैंडस्लाइड नाउकास्टिंग फॉर ऑपरेशनल अर्ली वार्निंग इन द हिमालयन रीजन विषय पर किया गया है। शोध को यूरोपीय भूविज्ञान संघ महासभा यानी ईजीयू-26 में प्रस्तुत किया गया। 

आईआईटी मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग के शोधार्थी अंकित सिंह, नितेश धीमान और भावना पाठक ने प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला के मार्गदर्शन में यह अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार हाल के वर्षों में अत्यधिक बारिश की घटनाओं में तेजी आई है। 
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इसका सीधा असर पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की घटनाओं के रूप में सामने आ रहा है। भारतीय हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते शहरीकरण और मानवीय गतिविधियों के कारण भी भूस्खलन का खतरा बढ़ा है। अध्ययन में वर्ष 2017 से 2024 के बीच हुई भूस्खलन घटनाओं के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। शोधकर्ताओं ने रैंडम फॉरेस्ट मशीन लर्निंग तकनीक के माध्यम से भू-आकृति, भूगर्भीय संरचना, जल स्रोतों, ढलानों और मानवीय गतिविधियों सहित विभिन्न कारकों का विश्लेषण किया।

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इसके आधार पर भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र तैयार किया गया और फिर बारिश के कारण भूस्खलन की संभावना का आकलन किया गया। दोनों मॉडलों को मिलाकर एक ऐसा नाउकास्टिंग सिस्टम तैयार किया गया है, जो वास्तविक समय के करीब भूस्खलन की संभावित स्थिति की जानकारी दे सकता है। 

इस तकनीक को भविष्य में हिमालयी क्षेत्रों की परिचालन प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली से जोड़ा जा सकता है। इससे प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से सतर्कता बरतने और लोगों को समय पर चेतावनी देने में मदद मिल सकती है। -प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला, प्रोफेसर, आईआईटी मंडी।
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