देवी-देवताओं के आगमन के साथ ऋषि पंचमी मेले का शुभारंभ
संवाद न्यूज एजेंसी
कटौला (मंडी)। उत्तरशाल इलाके की सेगली पंचायत के ऐतिहासिक धार्मिक स्थल पराशर में दो दिवसीय ऋषि पंचमी मेले का आगाज मंगलवार को देवी-देवताओं के आगमन से हुआ। मेले में सैकड़ों श्रद्धालुओं ने पवित्र झील में डुबकी लगाई। इस दौरान भवय देव मिलन भी हुआ।
मंगलवार को शुरू हुए मेले में पराशर ऋषि वाहेतमाम कमेटी उत्तरशाल के पुजारी रामसरन सुरन, कारदार प्यारे लाल, डुमच चमन, कमेटी अध्यक्ष चरण सिंह, लक्ष्मण दास कायथ (सचिव), सदस्य तेज राम, सूरजमणि, जेलता राम, तुलसी सुरन ने बताया कि इस मेले में ऋषि पराशर की मुख्य जलेब सुरन से अपने सभी देवलुओं और वाद्य यंत्रों के साथ पराशर धार के मंदिर में पहुंरी और उनकी मौजूदगी में मेला शुरू हुआ। मेले में मंडी और कुल्लू से सैकड़ों लोगों ने शिरकत की। इस मौके पर श्रद्धालुओं ने पवित्र झील में डुबकी लगाकर देवी-देवताओं से आशीर्वाद लिया।
मेले में सुरन से देव पराशर की मुख्य जलेब, बांधी से पराशर ऋषि का खारा, बरनाथ ऋषि हलगड़, अन्य देवी-देवता भाग ले रहे हैं। मंगलवार रात को मंदिर परिसर में जाग होम का आयोजन किया जाएगा। इसमें देवताओं के गूर अंगारों पर चलकर दैवीय शक्ति का प्रदर्शन करेंगे। बुधवार को देवी-देवताओं की रवानगी के साथ ही मेला भी संपन्न होगा।
बता दें कि देव पराशर की मुख्य जलेब प्राचीन काल से सूरन मंदिर से आती है। पराशर ऋषि के वाद्ययंत्र में प्राचीनतम मोहरा, वाद्ययंत्र भाणा, बयींच, ढाखलु होता है। देव पराशर ऋषि के पास विषी, पकोरी और ऋषि पंचमी मुख्य तिथियां हैं। इनमें महत्वपूर्ण भूमिका ननणी सुरन के पुजारी और दुमच और अन्य कमेटीदारों की ओर से पूर्ण की जाती है।
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यह है ऋषि पराशर मंदिर का इतिहास
देवभूमि हिमाचल सदियों से ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही है। ऋषि-मुनियों की तपस्या के कारण ही यहां कई धार्मिक स्थल बन गए। इनमें से एक तपोस्थल मंडी में ऋषि पराशर का भी है। जिसे अब पराशर के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि ऋषि पराशर अपने अध्यात्म के लिए उचित स्थान तलाश रहे थे। पहले उन्होंने ब्यास नदी के तट पर भ्यूली नामक स्थान पर तपस्या करनी चाही, लेकिन स्थान उपयुक्त नहीं होने से वे स्थान छोड़ गांव नसलोह पहुंचे। वहां के शांत वातावरण में तपस्या करनी चाही, लेकिन वहां भी उनकी तपस्या में विघ्न पड़ने से ऋषि वहां से उठकर आगे चल पड़े। कहा जाता है कि जहां ऋषि तपस्या करने बैठते, पहले वहां पानी निकालते थे। नसलोह गांव से निकलकर ऋषि उस स्थान पर पहुंचे, जिसे अब पराशर कहते हैं। जहां ऋषि ने एक स्थान पर बैठ कर अपना चिमटा मारा, वहां जमीन से पानी निकला, धीरे-धीरे वह पानी बढ़ता गया और झील का रूप धारण कर लिया। इसी तपस्या स्थल पर बाद में मंदिर भी बना दिया गया। इसके निर्माण के बारे में बताया जाता है कि इस मंदिर को बनने में 12 साल लगे हैं। यह मंदिर देवदार के एक विशाल वृक्ष से ही तैयार हुआ है। यह मंदिर तीन मंजिला है और पैगोड़ा शैली में बना है। पराशर मंदिर और झील समुद्र तल से 9,000 फीट की ऊंचाई पर हैं। यह स्थान मंडी से 48 किलोमीटर दूर है। पराशर ऋषि का दूसरा मुख्य मंदिर सुरन ननणी में स्थित है।