थुनाग (मंडी)। नोटबंदी को भुनाने के लिए मक्की की खरीद में बड़े व्यापारी पुरानी करेंसी को ठिकाने लगाने की जुगत में हैं। मक्की की फसल से काले धन को सफेद करने का धंधा प्रदेश में चल रहा है। व्यापारियों की यह जुगलबंदी किसानों पर भारी पड़ रही है। किसान पशोपेश में हैं कि यदि वह पुराने नोट लेते हैं तो वह उन्हें बैंक में कैसे एक साथ जमा करवाएंगे। यदि वह पुराने नोट नहीं लेते हैं तो उनकी वर्ष भर की फसल बिकने की बजाए घर में ही सड़ने का खतरा बना है।
प्रदेशभर में हर वर्ष हजारों क्विंटल मक्की की पैदावार होती है। नोटबंदी के बाद मक्की की फसल को बेचने में किसानों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। व्यापारी पुराने करेंसी नोटों को ठिकाने लगाने के लिए किसानों को उचित दाम रहे हैं लेकिन नई करेंसी नोट मांगने पर किसानों को आधी कीमत पर फसल को बेचने पर विवश किया जा रहा है। किसानों ने घर पर मक्की की फसल सुखा कर रख दी है। लेकिन, नोटबंदी से फसल को बेचना मुश्किल हो गया है। व्यापारी नए नोटों की एवज में 1100 रुपये प्रति क्विंटल दाम दे रहे हैं। वहीं, पुराने नोटों की एवज में व्यापारी एक क्विंटल का 2000 रुपये देने को तैयार हैं।
सराज के अधिकतर परिवार मक्की की फसल बेच कर सर्दियों के लिए दो व तीन माह के लिए राशन भर लेते थे। इस बार नोट बंदी से इन परिवारों को अपने घरों में जरूरत का सामान खरीदने के पैसे मिलने की उम्मीद धूमिल होती दिख रही है। सराज के लंबाथाच के बजौं निवासी कुंदन सिंह का कहना है कि पिछले कल बग्गी के बड़े व्यापारी को मक्की की खरीद के लिए फोन किया। व्यापारी का कहना था कि यदि पुराने नोट लेने है तो दो हजार प्रति क्विंटल मिलेगा। यदि नए नोट लेने हैं तो 1100 रुपये प्रति क्विंटल दाम मिलेगा। कुंदन लाल ने कहा कि बड़े व्यापारी भोले-भाले लोगों को ठग रहे हैं। स्थानीय किसानों जीवन सिंह, राम सिंह, प्रेम सिंह, प्रकाश कुमार, केशव राम, निरमू देवी, नंद लाल, जवाहर सिंह, टिकमु देवी, लाल सिंह, ओम प्रकाश ने कहा कि बड़ी मेहनत से फसल उगाने के बाद अब व्यापारियों की कारगुजारी उन पर भारी पड़ रही है। यदि पुराने नोट लेकर फसल बेचें तो नोट किसी काम के नहीं हैं। यदि नए नोट लें तो फिर आधी कीमत मिलने से घाटा ही होगा। सरकार को व्यापारियों पर लगाम लगानी चाहिए।