नगर परिषद से नगर निगम मंडी बनने के सफर में सिर्फ पदवी बदल पाई हैं। अध्यक्ष व उपाध्यक्ष की जगह मेयर व डिप्टी मेयर, जबकि ईओ की जगह आयुक्त ने संभाल ली है। लेकिन, नगर निगम को चलाने में अहम योगदान निभाने वाला स्टाफ टाउन प्लानर, लॉ ऑफिसर, सुपरिटेंडेंट, अकाउंटेंट, सेनेटरी ऑफिसर, हेल्थ ऑफिसर और जेई समेत कई पद खाली चल रहे हैं। ऐसे में नगर निगम के कई विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
हालात यह हैं कि टाउन प्लानर और लॉ ऑफिसर जैसे अहम पद खाली होने से नगर निगम शहर में अवैध तरीके से बने भवनों पर पीला पंजा चलाने में भी सक्षम नहीं है। ऐसे में नगर निगम अवैध कब्जों को हटाने के लिए नोटिस देने तक ही सीमित रह गया है। इसके अलावा शहर को सुव्यवस्थित तरीके से सुंदर करने में भी टाउन प्लानर की भूमिका रहती है। अकाउंटेंट और सुपरिंटेंडेंट जैसे महत्वपूर्ण पद खाली होने से वित्तीय संबंधी कई दिक्कतें नगर निगम झेल रहा है। बिल बनाने संबंधी परेशानियां भी झेलनी पड़ रही हैं। इससे वसूली भी सही समय पर नहीं हो पा रही है।
निगम में 189 पदों में से 121 अधिकारियों और कर्मचारियों के पद खाली
शहर में साफ-सफाई की व्यवस्था को सुनिश्चित करने में अहम जिम्मा संभालने वाले सफाई निरीक्षक का पद भी खाली है। इसके अलावा नगर निगम क्षेत्र में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का निवारण करने वाले हेल्थ ऑफिसर का पद भी कई दिनों से खाली चल रहा है। कुल मिलाकर नगर निगम में 189 पदों में से 121 अधिकारियों और कर्मचारियों के पद खाली चल रहे हैं। वहीं, वर्तमान नगर निगम का कार्यालय परिषद के हिसाब से बना हुआ है। ऐसे में यदि पूरा स्टॉफ आ जाता है तो उन्हें बैठाने में भी दिक्कतें पेश आ सकती हैं। कार्यालय निगम के हिसाब से नाकाफी है।
उधर, निगम के आयुक्त एचएस राणा ने बताया कि अहम पद खाली होने से विकास कार्यों को अंजाम तक पहुंचाना चुनौतीपूर्ण हो रहा है। स्टाफ की दिक्कत का मामला सरकार को बता दिया गया है। वहीं, निगम के मेयर वीरेंद्र भट्ट ने बताया कि पद खाली हाेने से विकास कार्यों को धरातल पर उतारने में देरी हो रही है। यह मामला सरकार के समक्ष उठाया गया है।
जेओए के तहत नियुक्त जेई से काम चला रहा निगम
नगर निगम जूनियर इंजीनियर का काम जेओए के तहत अधिकारियों से करवा रहा है, जबकि रेगुलर जेई एक ही है। ऐसे में विकास कार्यों के टेंडर, एस्टीमेट बनाने संबंधी अन्य विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। इसका सीधा असर शहर के विकास कार्याें पर पड़ रहा है। हालात यह है कि दो दिन में होने वाले काम एक माह तक खिंच रहे हैं।
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खर्चे कम करने के चक्कर में भी बढ़ रही दिक्कतें
बेशक स्टाफ की नियुक्ति न होने से नगर निगम लाखों रुपये बचा रहा है, लेकिन वार्डों में विकास कार्य प्रभावित होने से पार्षदों समेत नगर निगम को दिक्कतें भी झेलनी पड़ रही हैं। अहम पद खाली होने से नगर निगम आय के स्त्रोत बढ़ाने पर भी गंभीर नहीं दिख रहा है। हर माह नगर निगम 1 करोड़ 20 लाख रुपये वेतन, मेडिकल बिल व अन्य पर खर्च कर रहा है, जबकि आमदमी 25 से 27 लाख ही अर्जित हो रही है। ऐसे में नगर निगम खाली पदों को भरता है तो वेतन के लाले पड़ जाएंगे।