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एक थी रानी खैरगढ़ी में मिलेगी हिमाचल की झांसी की ढलक

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अमर उजाला ब्यूरो
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सुंदरनगर(मंडी)। 1857 की स्वतंत्रता की क्रांति ने भारत के प्रत्येक नागरिक में अपने देश को आजाद कराने की ललक की चिंगारी भारत के कोने-कोने में सुलगाई। इस पावन आहुति में मंडी जिला कहां पीछे रह सकता था। डॉ. गंगाराम का उपन्यास ‘एक थी रानी खैरीगढ़ी’ में स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर में मंडी जिला के योगदान की कहानी है। यह उन चरित्रों की अथक कहानी है, जिन्होंने अपने सर पर कफन बांध कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाई। इस कहानी का एक चरित्र रानी खैरागढ़ी का भी है जो रानी झांसी के समानांतर था। सोमवार को सुकेत साहित्य व सांस्कृतिक परिषद द्वारा मुंशी प्रेम चंद जयंती पंचायत समिति के सभागार में मनाई गई, जिसमें डॉ. गंगाराम के इस उपन्यास का विमोचन किया गया। इस मौके पर हिमाचल के लेखकों के साथ गाजियाबाद से आए प्रो. एमएम चंद्रा समीक्षक व आलोचक के साथ विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हुए मुंशी प्रेम चंद को वर्तमान के संदर्भ में विद्वान प्रसंगवश चर्चा करते रहे। डॉ. गंगाराम राजी के ऐतिहासिक उपन्यास ‘एक थी रानी खैरीगढ़ी’ का विमोचन एमएम चंद्रा, दीनू कश्यप, अदीप सोनी, सुरेन्द्र शर्मा ने किया। इस मौके पर डॉ. विजय विशाल के लेख प्रेम चंद के बहाने, आज के लेखकीय सरोकार’ और प्रियबंदा द्वारा, पितृ पक्ष व मातृ पक्ष भेदभाव लेख पढ़ा गया। इन्हीं दो पत्रों पर दीनू कश्यप, कृष्ण चंद महादेविया, पवन चौहान, बीआर शर्मा, नागेश भारद्वाज, प्रकाश पंत, रवि सिंह शाहीन, प्रकाश धीमान, उत्तम चंद शर्मा, कथाकार मुरारी शर्मा आदि विद्वानों ने चर्चा में भाग लिया।
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दोपहर बाद दूसरे सत्र में कवि समेलन में मंडी, बिलासपुर व कुल्लू से आए कवियों ने भाग लिया। जिसकी अध्यक्षता नागेश भारद्वाज, दीनू कश्यप, रवि शाहीन, प्रकाशपंत ने की।
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