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रसीली, लचीली लीची की खुशबू से बाग-बाग हुआ हराबाग

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- फोटो : अमर उजाला
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सुंदरनगर (मंडी)। सुंदरनगर का हराबाग क्षेत्र इन दिनों रसीली-लचीली लीची की खुशबू से महक रहा है। यहां के बागवानों का लीची की ओर तेजी से रुझान बढ़ा रहा है। यही वजह रही कि क्षेत्र में लीची का उत्पादन आम से बेहतर विकल्प के रूप में सामने आने लगा है। बागवान लीची के बगीचों से प्रतिवर्ष लाखों की कमाई कर रहे हैं। सीजन के दौरान यहां पर आम 25-30 रुपये किलो बिकता है लेकिन, लीची का भाव 80-100 से कम पर नहीं छूट पाता। हराबाग क्षेत्र की आबोहवा में लीची खूब फलने-फूलने लगी है। अब यह क्षेत्र आम के साथ-साथ लीची उत्पादन में भी पहचान बनाने लगा है। इन दिनों हराबाग क्षेत्र के बगीचों में लगे लीची के गुच्छे सहसा ही अपनी ओर सभी का ध्यान खींच लेते हैं। इस बार लीची की उम्दा फसल आई है। लिहाजा लीची उत्पादक काफी राहत महसूस कर रहे हैं। क्षेत्र में लीची का उत्पादन कराने का श्रेय उद्यान विभाग को जाता है। जिसने 60 के दशक में हराबाग, जड़ोल और मघान में लीची के बगीचे लगाए। उद्यान विभाग की चार दशकों की यह मेहनत अब बागवानों के लिए भी प्रेरणा बनती जा रही है। मौसमी कारणों से क्षेत्र में आम के उत्पादन में काफी गिरावट दर्ज की गई है। ऐसे में यहां आम उत्पादकों के लिए लीची एक बेहतर विकल्प साबित हुई है। बागवान शंकर राम, राजेंद्र कुमार, परस राम और सत्य कुमार बताते हैं कि मौसमी कारणों से आम उगाना घाटे का सौदा बनता जा रहा था। ऐसे में उन जैसे कई बागवानों ने लीची को आम के विकल्प के रूप में चुना। आज यह फैसला उनको काफी राहत दे रहा है।
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हर साल मिलती है बेहतर फसल : डा. यशपाल
बागवानी विशेषज्ञ डा. यशपाल ने बताया कि बारिश के मौसम में लीची के पौधों की रोपाई की जाती है। चार वर्ष की आयु का पौधा सैंपल देने लगता है। दस साल में पूरी तरह से फसल मिलनी आरंभ हो जाती है। आम की उम्दा फसल तीसरे साल प्राप्त होती है, जबकि लीची के पेड़ों से हर साल बेहतर फसल ली जा सकती है।
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