मंडी/नगवाईं। गांवों से लेकर शहरों तक बावड़ियों और प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी की गुणवत्ता राम भरोसे है। पेयजल स्रोतों को पंचायत से लेकर नगर परिषद स्तर पर साफ रखने की योजनाएं महज कागजों और प्रशासन की बैठकों में दिख रही हैं। जमीनी स्तर पर पेयजल सुरक्षा के दावे हवा हो रहे हैं और लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ हो रहा है। गर्मियों के सीजन में एक तरफ जहां प्रशासन, आईपीएच विभाग पीने के पानी को साफ रखने और क्लोरीनेशन के दावे कर रहा है वहीं, बरा गांव में 22 लोगों का पानी पीकर बीमार होना सरकारी तंत्र पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। यदि समय रहते मीटिंगों के कागजों से निकलकर अफसरशाही या पंचायत स्तर पर कोई काम संजीदगी से जमीनी स्तर पर हो तो इस तरह की नौबत नहीं आती है। हालांकि प्राकृतिक जलस्रोतों को साफ रखने की जिम्मेवारी खुद लोगों की भी है। लेकिन, प्राकृतिक जलस्रोतों का ध्यान न रखने और आसपास गंदगी फैलाने पर लोग भी जिम्मेवार हैं। अब प्रश्र उठता है कि इस अव्यवस्था पर आखिर कौन सुधारे?
सीएम और आईपीएच मंत्री भी यहीं के
सीएम से लेकर आईपीएच मंत्री मंडी जिले के हैं। लेकिन, पीने के पानी को लेकर इस तरह की घटनाएं सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही हैं। गांव से लेकर शहरों तक प्राकृतिक जलस्रोतों के संरक्षण की आखिरकार जिम्मेवारी किसकी है? ऐसे मामले सामने आने के बाद हर विभाग अपनी जिम्मेवारी से दूर भागता है। लेकिन, खामियां ढूंढकर उसे दुरुस्त करने में कोई विभाग तत्परता नहीं दिखाता।
प्रदेश में पानी की टंकियों में जहर के सामने आए हैं मामले
कांग्रेस कार्यकाल के दौरान सोलन के सुबाथू, कुनिहार के अलावा शिमला के रामपुर में पानी की टंकियों में कीटनाशक मिलाने के मामले पहने भी सामने आ चुके हैं। राजनीतिक मंच पर इसे लेकर काफी हो हल्ला हुआ। इन घटनाओं से सबक नहीं लिया गया और फिर पानी की सुरक्षा और गुणवत्ता पर सवाल उठना शुरू हो गया है।
पंचायत प्रधान से जवाब तलब
उधर एक्सईएन अरुण कुमार आईपीएच मंडल मंडी ने कहा कि स्रोत को टेकओवर करने की एक दो बार कोशिश की गई है। लेकिन स्थानीय लोगों व पंचायतों के हस्तक्षेप के कारण इसे टेकओवर नहीं किया जा सका है। पंचायत का यह जिम्मा है कि स्रोत में साफ सफाई बनाई रखे। पंचायत प्रतिनिधियों से बारे में जवाब तलब किया है।