दशहरा के अंतिम दिन भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में दलदल के कारण झेलनी पड़ी परेशानी
रथ खींचने में करनी पड़ी मशक्कत, लोगों के जूते, चप्पल भी यात्रा के दौरान कीचड़ में धंसे
संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव के अंतिम दिन भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में मैदान में बना दलदल रोड़ा बन गया। इस कारण रथयात्रा को पूरा करने में देव समाज के लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा।
तीन दिन से लगातार हो रही बारिश के कारण दशहरा उत्सव का मजा किरकिरा हो गया। रथयात्रा के दौरान पूरा मैदान कीचड़ से भरा हुआ था। हालांकि दशहरा समिति और प्रशासन ने रथयात्रा मार्ग में रेत डालकर यात्रा का रास्ता आसान बनाने का प्रयास किया लेकिन कीचड़ इतना अधिक था कि लोगों के जूते, चप्पल भी यात्रा के दौरान कीचड़ में धंस गए। रथ को खींचने में भी लोगों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। रास्ते में कई जगह रथ को रोकना पड़ा। इस कारण रथयात्रा का भी आधा घंटा से अधिक समय बाद समापन हुआ।
जैसे ही रथयात्रा भगवान रघुनाथ के अस्थायी शिविर से शुरू हुई तो कीचड़ में लोगों को रथ का रस्सा खींचने में परेशानी का सामना करना पड़ा ऐसे में हर बार जिस गति से रथयात्रा होती थी उस गति से नहीं हो पाई। हालांकि यात्रा अस्थायी शिविर से लेकर अंतिम छोर तक पहुंचने में दस मिनट का समय लगता था लेकिन इस बार 20 मिनट से अधिक समय लग गया जबकि अंतिम छोर में रथ को मोड़ने में भी काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। यहां रथ से खींच के लिए लगाई गई रस्सी में भी दिक्कत होने से रथ मोड़ने में ही काफी समय लग गया जबकि रथ को वापस लाने के लिए भी लोगों को काफी मुसीबत का सामना करना पड़ा।
पुलिस का काम आसान
मैदान में बारिश के कारण पैदा हुए कीचड़ से पुलिस को रथयात्रा के रास्ते से हटाने में ज्यादा कसरत नहीं करनी पड़ी। इसके लिए लोग पहले ही किनारों में खड़े रहे और यात्रा के लिए रास्ता खुला था परंतु कीचड़ देव समाज के लोगों को खूब सताया। बावजूद इसके देव समाज के लोगों ने कीचड़ की परवाह किए बिना ही रथ को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
जयकारों के बीच बढ़ता रहा रथ
कीचड़ से मुश्किल बनी राह में देव समाज के लोग जय श्रीराम, हर-हर महादेव, जय सीया राम के नारे लगाते गए और रथ को आगे बढ़ाते गए। आखिर में रथयात्रा को संपूर्ण करने में कामयाब हुए और यात्रा संपन्न होते ही इस यात्रा में शामिल 30 से अधिक देवी देवता अपने-अपने देवालयों की ओर लौट गए हैं जबकि सैकड़ों देवी देवता दिनभर यात्रा से पूर्व ही अपने अपने देवालयों की ओर लौटते रहे।