फेफड़ों से होकर खून में मिल दिल, दिमाग, किडनी और रक्त वाहिकाओं को पहुंचाते हैं नुकसान
मेडिसन डॉक्टर कल्याण सिंह बोले वायु प्रदूषण को स्वास्थ्य के रूप में देखा जाना जरूरी
बोले- पीएम-2.5 कण क्रोनिक टॉक्सिन के रूप में करते हैं काम, विशेषज्ञ ने दी चेतावनी
अजय कुमार
कुल्लू। वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरणीय चिंता नहीं रह गया है, बल्कि आने वाले समय में स्वास्थ्य के लिए एक मौन आपातकाल बनता जा रहा है। पीएम-2.5 नामक महीन कण मानव बाल से लगभग 30 गुना पतले होते हैं।
ये फेफड़ों से होकर खून में मिलते हैं और दिल, दिमाग, किडनी व रक्त वाहिकाओं तक पहुंचकर चुपचाप नुकसान पहुंचाते हैं। बच्चों के फेफड़े, वयस्कों की धमनियां और शरीर का मेटाबॉलिज्म इस घातक हवा की मार से प्रभावित होते हैं। विशेषज्ञ डॉ. कल्याण सिंह के अनुसार, प्रदूषण के केवल कुछ दिनों के संपर्क में रहने से भी रक्तचाप बढ़ सकता है और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
डॉक्टर के अनुसार बच्चों में प्रदूषित हवा फेफड़ों के विकास में रुकावट डालती है जिससे उनकी क्षमता स्थायी रूप से कम हो जाती है। वयस्कों में, सालों तक इसके संपर्क में रहने से धमनियों की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया तेज़ हो जाती है और दिल की बीमारी, स्ट्रोक, टाइप-दो डायबिटीज और न्यूरोडीजेनरेटिव विकारों का खतरा बढ़ जाता है।
ऐसे संपर्क में आते हैं कण
उनका कहना है कि यह घातक कण दूषित हवा के रोजाना संपर्क में आते हैं। इनमें जिनमें वाहनों का धुआं, खासकर डीजल उत्सर्जन, कोयला आधारित बिजली संयंत्र, औद्योगिक इकाइयां और ईंट भट्टे, निर्माण और सड़क की धूल, कचरा और कृषि अवशेषों को खुले में जलाना और खाना पकाने के लिए ठोस ईंधन का उपयोग शामिल है।
यह प्रभाव पड़ता है
डॉक्टर के अनुसार एक बार जब पीएम-2.5 खून में मिल जाता है तो यह लगातार कम-ग्रेड सूजन को ट्रिगर करता है। इससे रक्त वाहिकाएं तेजी से बूढ़ी होती हैं, खून के थक्के बनने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, और चीनी और वसा का मेटाबॉलिज्म गड़बड़ा जाता है। वायु प्रदूषण में अल्पकालिक वृद्धि भी गंभीर जोखिम पैदा करती है। उन्होंने कहा कि उच्च प्रदूषण स्तर के एक से तीन दिनों के भीतर, रक्तचाप बढ़ सकता है, दिल की धड़कन अस्थिर हो सकती है और खून में थक्के बनने की संभावना अधिक हो जाती है।